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________________ (१४१) चौइंद्रिय जीवोंकी दो दो लाख, मनुष्यों की चौदह लाख और नारकियों, देवों तथा पशुओंकी चार चार लाख जातियां हैं । इस तरह सब ५२+६+१४+१२-८४ लाख जातिके जीव मुझपर क्षमा करें । मैं भी उनपर क्षमा भाव रखता हूं। क्योंकि क्षमाका विरुद्ध भाव जो वैर है, उसके करनेसे घात होता है-भव भवमें दुःख सहना पड़ते हैं । वे त्रेसठ कर्मप्रकृतियां कि जिनका नाश होनेपर केवलज्ञान होता है। नर्क पसू गति आनुपूरवी प्रकृति चारि, पंचेंद्रिय बिना चारि आतप उदोत हैं। साधारन सूच्छम औ थावर प्रकृति तेरै, नर आव विना तीनि मिलि सोलै होत हैं । सैंतालीस घातियाकी त्रेसठि प्रकृति सब, नासि भए तीर्थकर ग्यानमई जोत हैं। देवनके देव अरहंत हैं परम पूजि, तिनहीको बिंब पूजि होहिं ऊंच गोत हैं॥९७॥ अर्थ-१ नरक गति, २ तिर्यंच गति, ३ नरकगत्यानुपूर्वी, ४ तिर्यचगत्यानुपूर्वी, पंचेन्द्रियको छोड़कर शेष चार इंद्रियां अर्थात् ५ एकेन्द्री, ६ दोइंद्रिय, ७ तेइंद्रिय, ८ चौइंद्रिय, ९ आतप, १० उद्योत, ११ साधारण, १२ सूक्ष्म और १३ स्थावर इन तेरहमें नर आयुको छोड़कर शेष तीन आयु मिलानेसे' अर्थात् नरक आयु, तिर्यंचायु और देव आयु
SR No.090117
Book TitleCharcha Shatak
Original Sutra AuthorDyanatray
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granth Ratnakar Karyalay
Publication Year1926
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Principle
File Size9 MB
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