SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 132
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १०६ लिन उद्धररु एन्टक जिन विमल मोम्टन्क । सिरि भूवलय राथि सिद्धि संघ बंगलोर-दिल्ली रिश षि इप्पत् प्रोम्दु श्री शुद्धमति देव । रस ज्ञानमति सुज ञ देव।। वशदइप्पत् अन्ककष्णहत् प्रोम्बतम् । यशोधर हदिनेन्टरंक ॥७॥ रण* वपद्म विमलांक हदिवए परमेश । अब हविनार् एम्ब दे वा ॥ नवमत्तु प्रारम्क जिनह ज्ञानेश्वर । नव ऐड उत्साहरंक ॥१८॥ ब* नवर वन्दित शिवगण हदिम्ऊरु । घन कुसुमान्जलि दे बा* जिनरु हनएरडंक सिन्धत्रु होमदु । जिनरु सन्मतियु हत्पन्क ॥५६॥ जिनरु अनगोर अोमबत्तु ॥६॥ जितरु उद्धररु एन्टक ॥६१॥ जिन अमलप्रभरेळु ॥६॥ घन सुरत्त् प्रान्कवु पार ॥६३॥ जिन श्री धरान्कवु ऐदु ॥६४॥ जिन विमल प्रभ नाल्कु ॥६५।। जिन देव साधु मूरक ॥६६॥ धन सागर एरडाक ॥६७॥ जिना निर्धारण प्रोमदनक ॥६॥ अनुगाल विनिताद अंक ॥६६॥ जिन भूत वर्तमानांक ॥७॥ एनुबाग बन्द भूबलय ॥७॥ त* नुवळिदतनुव गेलदक विन्तागे । ततुलिबवरकम् स* व नव।। एनुविप्णत्नाल्वरनागत तोर्थका जिन सिद्धनाम स्वरवप ॥७२॥ स वरण महापद्म मोदलागे सुरदेव । जिन एरडे सुसुपारी ॥ त* नि मूरु स्वयंप्रभ नाल्कु सर्वांत्म भू । तनुजिन ऐबबरन्क ॥७॥ लो* कयकर् देवपुत्राख्य आरन्कबु । आ कुल पुतर सेरुयु दु* ॥श्री कर एळु महोदक एन्टागे । श्री कर नवम प्रोष्ठिलर ॥४॥ य* श जयकीति हत्ता मुनि सुबत ॥ ऋषिहत् प्रोमदु एन्दुक त* अ। यश अरद्वादश पुष्पदन्तेशरु । वशवागे हदिमूररक ॥१५॥ रस चतुर्दश विष्कषाय ॥७६॥ यश हदिनयदु श्री विपुल ॥७७॥ वश हादनाहरु निर्मला ॥७॥ रिषि चित्रगुप्त सप्तदश ॥७॥ यशहदिनेन्दु समाधि ॥०॥ वश गुप्त श्री जिनरन्क ॥१॥ रस्वयम्भू हतप्रोम्बग्रंक।।२।। यश अनिवत्त इप्पत्तु ॥५३॥ रस विजयरु इप्पत ओम्दु ॥१४॥ यशद विमल इप्पत् एरडु॥८॥ इप्पत्मरु देवपाल ॥६॥ असमान महानन्त वीर्य ॥७॥ रस अनागतइप्पत् नाल्कु ॥८॥ कुसुम कोदन्डदल्लगर ॥६॥ रसदेप्पत् एरडन्क नेवम् IIEl दिशेयन्क पोमबत्तु काध्य ॥११॥ रस काल तीर्थकरन्क ॥२॥ यशदन्क काव्य भूवलय ॥३॥ वशमूरु मूरळोमबत्तम् ॥६४॥ बेसदन्क काव्य भूवलय ॥६५॥ पू# वोपाराजित कर्मद केडिसिद । पूर्वदिप्पत्ताला इनि तो । निर्मलदोगरण इप्नाल्क्मन्कद। धर्म मुन्दरण इप्पत्नाल्कु ॥६६॥ र सद ई कालद श्रीतोयनाथर । रस कूटदलि एरडेछ।। बेस र वनत्रय मूरु सूरल प्रोमबत्तु । शवदे मूह कालान्क ॥१७॥ २४४३=७२ * रदे ई मूरु गुणकारविम्बन्द । हारमरिणयनगवद ॥ सार ग* रन्थद हदिनाल्कु गुणस्थान । दारदगुणकारबिन्द ॥६॥ ३४३ ए वपद प्राप्तिय गुणकार मग्गियिम् । सविहदिनाल्कन्क र सदिम् ॥ सबनिसेसाविरदेन्टुबलद पद्म । दवतारदक्षरदंक En: [७३४१४=१००८.] ग मनिसि साविरदेन्दु दलगळळळ । कमलपळ एर काल न रु ॥ कर्मपाच प्रोमदारिम् गुरिगसे सोन्नेयु श्रा, विमल सोन्ने एन्ट, पारेरडेरड्ज ॥१००॥ [१००८४ २२५-२२६८०० दोष विनाशनवादप्रोमदेपाद । वाशक्तियतिशयपुष्य ॥ राशिय य* रतर गरिणतदोळात्मन । प्रा सिद्धरसव माडुवुदु ॥१०॥ श्राशेयनेल्ल कूडिपुबुम् ॥१०२॥ राशिकर्मव कळेपुवुद् ॥१०३।। श्रीशन माडुत बहुदु ॥१०४॥ लेसतु साधिसलहृदु ॥१०॥
SR No.090109
Book TitleSiri Bhuvalay
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhuvalay Prakashan Samiti Delhi
PublisherBhuvalay Prakashan Samiti
Publication Year
Total Pages258
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Principle
File Size10 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy