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________________ गणित काव्य यशस्वति रेविय मगळाद बाहोगे। असमान काटकद । मनविटूटु कलितनाद कारणविंदा मनुमथ नेनिसिबे देव।। 'रिसियु' नित्यवु अरतनाल्कल्कक्षर। होसेद अंगय्य भूवलय। इस अक्षर अंक गणितको मनःपूर्वक सीखने वाले होने के कारण बाहुबली करुणोयम् बहिरंग साम्राज्य लक्ष्मिय । अरहनु काटकद । का नाम मन्मथ भी इसी तरह पड़ा है ऐसा इस श्लोक से प्रतीत होता है । इस- सिरिमातायतते बोंरिपेळिद । अरवत्नाल्क भवलय ॥ लिए इसके निमित्त से इस अंक गणितके कर्ता बाहुबली को माना है । इस अंक 'धर्म ध्वज' वदरोळु केतिदचक्र । निर्मलदष्टु हगळम । चक्र का उपदेश बाहुबली ने जब बड़ा भाई भरत के साथ पाठ प्रकार का युद्ध सर्व मनदगल' केवतोंटु सोनय । धर्मद कालुलक्षगळे ।। हुचा था उस समय अपने भाई का अपमान करने के प्रति उनके मन में वैराग्य प्रापाटियंक दोळ ऐदुसाविर कूडे । श्रीपाद पद्म दंगदल 11 हुया था उस वैराग्यमैं अंत समयमें भरत चक्रवर्तीने समझा कि ये तो अब मुनि १-२३-३०-६५-६ होकर कर्म का क्षय करके मोक्ष चला जायगा । इस लिए इन से कुछ दान यह चक्र ५१०२५०००+५०००=५१०,३०००० दल अंक रूप में मांगना चाहिये । इस तरह उनको उन्होंने कहा । तब बावली सपा विरक्त अक्षर होकर गणित पद्धति के अनुसार रचना की है इस काव्य को ही कुमुदेन्दु होने के कारण उनके पास कुछ चीज देने योग्य नहीं यो। पीर पाहार दान, । प्राचार्य ने स्पष्ट रूप में कहा है। शास्त्र बान, पौषध दान और अभय दान के अतिरिक्त और कोई दान देने योग्य अनादि काल से यह चक्रबद्ध काव्य आदि तीर्थंकर से लेकर महावीर नहीं था। परन्तु मन में यह विचार किया कि मेरे पिता ने जो मुझे शास्त्र दान तक इस की परम्परा वरावर चली आई है। जब भगवान महावीर को केवलदिया है। उसी को मेरे भाई को देना उचित है। अन्य तीन दान मेरे द्वारा। ज्ञान हो गया तब महावीर की वह दिव्य वाणी (दिव्य पनि) सर्व भाषा देने योग्य नहीं । ऐसा विचार करके अपने पिता के द्वारा अपनो दोनों बहिनों से। स्वरूप होने लगी। उस समय महावीर के सबसे प्रथम गणधर इन्द्रभूति ब्राह्मण समझी हुई "अक्षरांक समन्वय पद्धति" का आदीश्वर भगवान ने अपने को उपदम किया था वैमा ही सम्पूर्ण ज्ञान को सर्व भाषामयी ज्ञानमें जैसे अन्सभुक्त। कर्नाटक, संस्कृत, प्राकत आदि अनेक भाषाओं के बिद्वान थे, उन्होंने ही महा वीर की वाणी का अवधारण कर भव्य जीवों को वस्तु स्वरूप समझाया था। कहा था उसी तरह इस संदर्भ को जैसा कि श्री कुमुदेन्दु प्राचार्य ने भूवलय के गणधर के बिना महाबीर की वाणी ६६ दिन तक बन्द रही, क्योंकि यह नियम पहले अध्याय के उन्नीसवें लोक में कहा है कि है कि तीर्घदूर की बागी विना गणघर के नहीं खिर सकती। भगवान महावीर लावण्य दंग मेप्याद गोमट देव । आवागतन्न अण्ण निगे। के मोक्ष जाने से पूर्व तक गौतम इन्द्रभूनि नें उनकी वाणी का समस्त संकलन ईवाग चक्रबंधद कटिनोळ कट् ि। वाविश्वकाव्य भूवलय।। करके राजा थेरिएक और चेलना रानो एवं अन्य सभा के लोगों को उसका इस प्रकार कहे हुए समस्त कयन पर से पोर कुमुदेन्दु प्राचार्य के मता- भान कराया था। इसके बाद प्राचार्य परम्परा से जो पुराण चरित एवं कथा नुसार इस भूबलपर्क पादि कर्ता गोमटदेव ही हैं। इस काव्यको भरत वाहवली साहित्य तथा सिद्धांत ग्रन्थ रचे गए वे मन महावीर की वाणी के अनुरूप थे युद्धके बाद जब बाहुबली को वैराग्य हो गया, सब उन्होंने ज्ञान भंडार से भरे ऐसा कुमुदेन्दु प्राचार्य ने अपने भूवालय ग्रन्थ में प्रकट किया है। हुए इस काम को अन्तमुहूर्त में भरत चक्रवर्ती को सुनाया था। वहीं काव्या प्राचार्य कुमुदेन्दु ने नवमात्र से जो गग्गिन में काव्य रचना की है उसे परम्परा से पाना हुया गणित पद्धति अनुसार अंक दृष्टि से कुमुदचन्द्राचार्य द्वारा 'करण मूत्र' नाम प्रकट किया हैं। इसके सम्बन्ध में दो तीन लोक उद्धृत चक्रबंध रूप में रचा गया है। 1 किये जाते हैं
SR No.090109
Book TitleSiri Bhuvalay
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhuvalay Prakashan Samiti Delhi
PublisherBhuvalay Prakashan Samiti
Publication Year
Total Pages258
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Principle
File Size10 MB
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