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________________ सिरि भूवलय - मार्य सिद्धि संघ बंगलौरदिल्ली मन शुद्धियात्म भूवलय ॥११३॥ तनुविन अतनु भूवलय ॥११४॥ तनगात्म शुद्ध भूवलय ॥११५॥ कनकद कमल भूबलय ॥११६॥ प्रा* दिगनादिय कालवे निन्नेयु ई दिन नोनु बाळुबुदु । प्रादियवश र दनत्रयगळ साधिप । नादि अनन्तवे नाळे ॥११७॥ ग* मनिसलेल्लर्गे सम्यक्त्व रत्नद । क्रमदत्कबधुनाम् हुट्टि।। समतेय खड्गदिम क्रोधमानवगेल्व पिनलांकनाळेय दिवस ॥११॥ म नद दोषके शास्त्र तनुविन दोषके । घन हदिमूरु कोटियवश प्र* जिनर वयुद्यागम वचन दोषके शब्द । बेनुबक मूरु भूवलय ॥११॥ मिदु मधुरतेयिद हरदयवाळवदिव्य । हदनाद मुदवीश्री व यण ॥हरुदयांक पद्मद दलवेरि नाळेय । हदनकारिणसुवअदत ॥१२०॥ दिनुविंदु वर्तमान निनयतोतबु । घननाळे अनागतवा भर तणषु द्वैताद्वैत जयनव कूडिप । मनुज विविज धर्म दन्क ॥१२॥ जिन वर्धमान धर्माक ॥१२२॥ मनुजरेरिगोम्दे धर्म ॥१२३॥ तनु विनोळात्म सध्यम ॥१२४॥ घननाळे इन्दु निनेगळ ॥१२॥ कोनेयादियन्क मूरारु ॥१२६॥ जिन धर्मदैया सिद्धांत ॥१२७॥ मनुजरिग प्रोम्दे सद्धर्म ॥१२८॥ मनुजर ज्ञानसूत्रांक ॥१२६॥ शरणसदे वाळव(सूत्रांक)सम्यक्त्व ॥१३० अनुजरागिसुव सन्मन्तर ॥१३॥ घन विरारूप सूत्रांक ॥१३२॥ जिन विष्णु शिव दिव्य ब्रह्म ॥१३३॥ तनयर सलहुव मन्त्र ॥१३४॥ धनबंध पुण्य सबंध ॥१३५॥ विनय सद्धर्मद् अहिम्से ।।१३६॥ घनसत्य भद्र भूवलय ॥१३७॥ प* रिशुद्ध वतगळम् अणु महाद एननुध । हनुमन्त जिन व ररका मुनिसुव्रतर कालदे बंद रामांक । जिन धर्म वर्षमानांक ॥१३॥ रिश दधियोळ् श्री वालि मुनिगल गिरियंक । शुद्ध सम्यक्त्व ल* क्षणदा। बुद्धिरिद्धियोळगरण यशद समन्वय । शुद्ध रामायरगदक ।।१३६॥ ककै विगे वाल्मीकिय रसदूट उणिसुव । सविये महावतदेक। पत्र वेय मुच्नुव कालदलि बहदोषच । नक्शुद्धिगोळिप दिव्यांक १४०। हि रिय दोषगळिगे अणु व्रतगळनित्तु । हिरिय महावत सि द्धि । धरेगे मंगलदप्राभृतद दर्शनदित्तु परिशुद्धबागिसिदंक ॥१४॥ य शस्वति देविय बसिरिन्द वन्दनक । वशद ब्रह्माण्ड * अक्षरद।। रसवनन्गय्य मूलदलि सुरिसिदंक । विषहर नीलकंठांक ॥१४२॥ म् नमथ दोर्बलियादिय तंगिगे । घनद् नवमांक दर्शन धा* अनुभव वन्नित्तु जिनरादि प्रोस्वत्त । तनुजर्गे शून्यदोळ् तोरि ॥१४३॥ जिन धर्मद् अोमबत्तम् सारि ॥१४४॥ जिन स्मार्त विष्णुगळन्क ॥१४५॥ तनुविनोळात्मन तोरि ॥१४६॥ कोनेयलि 'सोन्ने' यागिसुत ॥१४७॥ तनुदोष प्रोम्दे एन्देत्तुत ॥१४॥ सुनय दुर्नयगळ तोरि ॥१४॥ कोनेगे दुर्रनयगळ केडिसि ॥१५०॥ सुनयद अतिशयवेरसि ॥१५१॥ कोनेगे अनेकान्तवेरसि ॥१५२॥ चिनुमयत्वव तनगिरिसि ॥१५॥ दनुजर हिम्सेयम् बिडिसि ॥१५४॥ जिनमार्ग सुन्दरवेनिसि ॥१५॥ विनय धाक भूवलय ॥१५६॥ ते रस गुणस्तथानदन्त के बरुवाग । दारि सम्यक्त्ववेन्दे न ब॥ सार श्रीजिन वारिणयनुभवबन्दाग । नूरुसागरकर्म केडुगु ।।१५७।। पर वपददाविय प्ररहंत प्रोम्दुस् । अवेरडरलि सिद्धम् तर नवदादि मूरन्क प्राचार्य नाल्कर । बिवर उपाध्याय ऐदु ॥१५८॥ द रितब वहनवे साधु समाधिय । सरुव साधुत्व प्राररलि ॥बरे नाश ळे सधर्म एळक प्रागम परिशुद्ध जिनबिम्ब एन्दु ॥१५॥ क विव गोपुर द्वार शिखर मानस्तम्भ । दनिय बिम्बालय म* नवमवेन्दनुवरु आगम परिभाषे। विवरवे नव पददमक ॥१६॥ 'हिरियाशे विदरलि बपकेयद तबु । वरमुन्द के द्वत घे न॥ सरियरिगे मुक्तियुभयमुक्तिय लाभ गुरुपवसिद्धि ईवरिगे ॥१६॥
SR No.090109
Book TitleSiri Bhuvalay
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhuvalay Prakashan Samiti Delhi
PublisherBhuvalay Prakashan Samiti
Publication Year
Total Pages258
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Principle
File Size10 MB
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