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________________ सिरमूवलय ५४ में १ मिलकर = ५५ = १० (यह सौंदरिय अन्क) पोडविय हदिनेन्दु लिपिय ॥६३॥ विडिसलार प्रोम्बत्तरक ॥६४॥ गडिय मूरल मूररन्क ॥६५॥ सङगरल हदिनेन्दु ॥६६॥ डिडिगळनोड गूडिदन्क ॥६७॥ कडेगे ऐवत्नाल्करक ६८॥ प्रोडगडे ऋयहाँदनेन्दु ॥६६॥ नडेघ मुरर मोमबत्ताक ||७०॥ अडविय बनवासियक ॥७१॥ मडदिय त्यागिगळक ॥७२॥ इडिदु कूडिवर अोम्दे अन्क॥७३॥ बिडिसि नोडिदरोम्दे अन्क ॥७४॥ गुडियोळाडुव ज्ञानदन्क ॥७॥ सुउियु करमाटकमन्क ॥७६॥ हिडिय मातुगळ भूवलय ॥७७॥ प्रोडगूडे करमाटकअनक ॥७॥ पर रमम् पेलिद हदिनेन्टु मानिन । सरसद लिपि ई नवम ॥ वर म नगल प्राम्हतदोळु अन्कव । सरिगडि बरुवे भाषेगळम् ॥७॥ र सवु मूलिकेगळ सारव पोर बन्ते । होस करमाटक भाषे ॥ रस २ री नवमान्कवेल्लरोळ्बेरेयुत । होसेदु बन्दिह प्रोम् प्रोमदन्क ॥८॥ स रम वादा प्रोम्कार दोळडगिद । सर्वज्ञ वारिणयन होसेघे ॥श् रेॐ यम् पोन्दुतगरिगतबन्धदोळ् कटि । धर्म सासराज्यदन्कदो ॥१॥ प* बवागिसि पद पद्मवनागिसि । हरुदय पद्मा दलरि ।। सद य त्ववेनिसिमेदुळ होक्कु केल्वर । ह रुदयके करमवाटवनु ॥२॥ रा* गव वयाग्यवनोम दे बारिगे। तागिसे करणार कद ।। बागिल सा लिनिम् परितन्व कारण । श्री गुरु वर्धमानान्क ॥३॥ ९४६ - ५४ ईग सम्ख्यातदन्क 1४1 नागल सम्रूयातदन्क | देशदनन्त समरूपान्क ॥८६रागद मध्यमानन्त ॥८॥ तागलु उत्क्रुष्टानन्त ॥ प्रागुवनस्तानन्ताक ॥८६शरी गुरु मध्यमानन्त ॥९॥ श्रोम् गुरु उत्कृष्टानन्त ॥१॥ आगर रत्नत्रयान्क ॥२॥ चागर शाश्वतानन्त ६३ जागरविरुव भूवलय ॥ ४॥ ग* मनिसे 'अथवा प्राकरत संस्कृत। विमल 'मागध पिशाच' म भा ॥ सम 'भाषाश्च शूरसेनी च' द । करमदें षष्टोतर' बभरि ॥५॥ व रुशिसे 'भेदोवेशविशेषा'द । वर विशेषादपभ रमशह ॥ परम् प* द्धतियिन्तिवरनु मूररिम् । परि गुरिशसलु हदिनेन्टु ॥६॥ म* रळिसलयवा 'कर्णाट मागध'वरे। बरलु'मालव लाट गौड'। वरिपरि 'गुर्जर प्रत्येक प्रयमित्य' । वरद 'ष्टादश महा भाषा' ॥७॥ म रळि मरलि बेरे विधविन्द पेव । गुरुवर सन्ध भेगळ ।। व* रकान्य सरणिय शप्लियन्तिरळोग । सरस सक्नदरिय रिदम्क ॥९॥ ग* बमाक गबनेयोल भूषलय सिद्धांत । अवरतुळोमवव र* नका ॥ नवमनु प्रतिलोमवागिसि बन्दन्क । सविय भूवलय सिद्धांत |2| सा* विरदेन्दु भाषेगळिरलवनेल्ल । पावन महावीर वारिस । काब घ र्माकवु अोमबत्तागिपाग 1 तावु एळ्नूर हृदिनेन्दु १००। ६४३-१८ । १८४३ =५४ कासदु हम्सद लिपियम ॥१०॥ नावरियद भूत लिपियु ॥१०२५ शरो वीर यकषिय लिपियु ॥१०॥ ठाविन राक्षसि लिपियु ॥१०४॥ तावहिल ऊहिया लिपियु ॥१०५॥ काये यवनानिय लिपियु ।।१०६। कावद तुर्किय लिपियु ॥१०७।। पावक दरमिळर लिपियु ॥१०॥ पावेव सइन्य लिपियु ॥१०६॥ ताव मालवणोय लिपियु ॥११०॥ श्री विधकोरिय लिपियु ॥११॥ पावन नाडिन लिपियु ॥११२॥ देव नागरियाब लिपियु ॥११३॥ वविध्य लाडद लिपियु ॥११४॥ काविन फारशि लिपियु ॥११॥ काव आमित्रिक लिपियु ॥११६॥ भवलयद चाणक्य ॥११७॥ देवि ब्राह्मिा मूलदेति ॥११॥ श्री वीर वारिण भूदलय ॥११॥ देवि सवन्दरिय भूवलय ॥१२०॥ पु* ट्ट भाषेगळेळु नूरक मातिन । गट्टिय लिपिगळिल्लदं न कर हुनपर भाषेय नरियुव । हुलिललद लिपियनक ॥१२॥ व र 'सर् वभाषाम इ भाषा एन्नुव । प्ररहन्त भाषित वाक्य भा पर विश्व विद्यावभासिने (एन्नुब)एन्देम्बा परिभाषेय अंक ॥१२२॥ वा* सवरेल्लराडुव दिव्य भाषेय । राशिय गरिगतदे कट्टि।। पाशा बस मारुत कुम्भदोळडगिति श्रीशनेळ नूरनक भाषे ॥१२॥ इबरोळ हृदुगिह दिनेन्दु भाषेय। परगळ गुरिणसुत बरुव * सवनव तोरेदु तपोवनवन सेरे। हरुवय के शान्ति ईवन्क ॥१२४॥
SR No.090109
Book TitleSiri Bhuvalay
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhuvalay Prakashan Samiti Delhi
PublisherBhuvalay Prakashan Samiti
Publication Year
Total Pages258
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Principle
File Size10 MB
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