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________________ ८० परमात्मा द्विधा सूत्रे सकलो निकलः स्मृतः । सकलो भण्यते सद्भिः केवलो जिनसत्तमः ॥३५६॥ सूत्र में परमात्मा सकल और निकल के भेद से दो प्रकार के माने गये हैं । सज्जनों ने जिन श्रेष्ठ केवली को सकल परमात्मा कहा है। निष्कलोमुक्तिकान्तेशश्चिदानन्दैकलक्षणः । अनात सुखपत तः कर्माष्टक विवर्जितः ॥३५७॥ मुक्ति रूपी कान्ता के स्वामी चिदानन्दैकलक्षण, अनन्त सुख से सन्तृप्त और पाठ कर्मों से रहित निकल परमात्मा हैं। _ जीव: वर्णमेकं रसं गन्धं स्पर्शयुग्मं च गाहते। पुद्गलाणुः परः प्रोक्तो गलनपूरणात्मकः ॥३५८॥ दूसरा द्रव्य पुद्गल है । यह एक वर्ण, रस, गन्ध और स्पर्श युगल को व्याप्त करता है तथा उसे पूरण-गलन स्वभावी कहा गया है। द्वयणुकादि विभेदेन स्निग्घरुक्षत्वसंश्रयात् । बन्धोऽन्योन्यं भवेत्तेषां वृद्धिरुपादनेकधा ॥३५६॥ . स्निग्ध और रूक्षत्व गुण के आश्रय से द्वयणुकादि के भेद से पुद्गलों का पारस्परिक बन्ध होता है । यह वृद्धि की अपेक्षा अनेक प्रकार का होता है। १ अयं पाठः क-पुस्तके नास्ति ।
SR No.090105
Book TitleBhav Sangrah
Original Sutra AuthorVamdev Acharya
AuthorRamechandra Bijnaur
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages198
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Principle
File Size10 MB
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