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________________ ७७ उपयोगो हि साकारो ज्ञानलक्षण लक्षितः । स चाष्टधा भवेन्मिथ्या सम्यग्ज्ञानप्रभेदितः ॥३४१॥, ज्ञान लक्षण से लक्षित उपयोग साकार होता है, वह मिथ्या और सम्यग्ज्ञान के प्रभेद से आठ प्रकार का होता है । कुमतिः कुश्रुतज्ञानं विभङ्गाख्योऽवधिस्तथा । अज्ञानत्रितयं चेति मिथ्याकर्मफलोद्भवम् ॥३४२॥ कुमति ज्ञान, कुश्रुत ज्ञान तथा विमङ्ग नामक अवधिज्ञान, इस प्रकार के अज्ञान मिथ्यात्व कर्म के फल उत्पन्न होते हैं । मतिः श्रुतावधि स्वान्तः केरलं चेति पञ्चधा। सम्यग्ज्ञानं भवेत्तस्य वर्तनं स्वार्थगोचरम् ॥३४३॥ - मति, श्रुत, अवधि, मनः पर्यय तथा केवलज्ञान इस प्रकार पाँच प्रकार का सम्यग्ज्ञान होता है। उसकी प्रवृत्ति स्वार्थगोचर होती है। स्याद्दर्शनोपयोगस्तु चतुर्भेदभुपागतः । निराकारो हि तस्यास्ति स्थितिरान्तमुहूति तो ॥३४४॥ चार प्रकार का निराकार दर्शनोपयोग होता है । उसको स्थिति अन्तर्मुहूर्त की है। चक्षुर्दर्शनमाद्य स्यादचक्षुर्दर्शनं ततः । अवध्याख्यं च कैवल्यं चतुर्वेति प्रचक्ष्यते ॥३४५॥ चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधि दर्शन तथा केवलदर्शन । इस प्रकार दर्शन चार प्रकार का कहा जाता है।
SR No.090105
Book TitleBhav Sangrah
Original Sutra AuthorVamdev Acharya
AuthorRamechandra Bijnaur
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages198
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Principle
File Size10 MB
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