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________________ अपूर्ण नरक के जीवों में तथा समस्त लब्ध्यपर्याप्त जन्तुओं में सासादन गुणस्थान नहीं होता है, यह निश्चित है । पाहारकद्वयं तीर्थकर्तृत्वनामकर्म च । सासादनो न बध्नाति सम्यक्त्वस्य विराधनात् ॥३०॥ सासादन गुणस्थानवी जीव सम्यक्त्व की विराधना से आहारक द्वय तथा तीर्थकर्तृत्व नाम कर्म नहीं बांधता है । भव्यत्वोदयता तस्य सम्यक्त्वग्रहणाद्विदुः।। तद्ग्रहणस्य सामर्थ्यात्कियत्कालेन सिध्यति ॥३०॥ उसकी भव्यत्वोदयता सम्यक्त्व के ग्रहण से मानी गई है । सम्यक्त्व ग्रहण की सामर्थ्य से भव्यत्वोदया कुछ काल में सिद्ध होती है। पश्य सम्यक्त्वमाहात्म्यं कियत्कालाप्तिसंभवम् । ततोऽत्र भावना भव्य ! कर्तव्याहनिशं त्वया ॥३०२॥ थोड़े ही समय के लिए जिसका प्राप्त होना सम्भव है, ऐसे सम्यक्त्व के माहात्म्य को देखो । अतः हे भव्य ! तुम रात दिन सम्यक्त्व की भावना करो। सासा' दनगुणस्थानं व्यवहारात्प्रकथ्यते । क्षायोपशमिको भावो मुख्यत्वेनेह जायते ॥३०३॥ सासादन गुणस्थान का कथन व्यवहार से किया गया है। इसमें क्षायोपशमिक भाव मुख्य रूप से उत्पन्न होता है । इति द्वितीयं सासादनं गुणस्थानम् । १ श्लोकोऽयं ख-पुस्तके नास्ति। २ सासादनगुणस्थान द्वितीयं' इति ख-पाठ ।
SR No.090105
Book TitleBhav Sangrah
Original Sutra AuthorVamdev Acharya
AuthorRamechandra Bijnaur
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages198
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Principle
File Size10 MB
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