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________________ ४६ जिनोक्ति से विपरीत इस प्रकार के शास्त्र समूह की रचना करके यह निरंकुश गुरुद्रोही कथन करता है । यस्यानन्तसुखं तस्य नास्त्याहारप्रसंगता। यद्यस्त्यन्नतसौख्यानां व्याधातो जायते ध्र वम् ॥२१२॥ जिसके अनन्त सुख है, उसके आहार का प्रसङ्ग नहीं है । यदि आहार का प्रसङ्ग है तो अनन्त सुखों में निश्चित रूप से व्याघात होता है। नास्तिक्षुधां विनाहारः क्षुन्मुख्या दोषसंहतिः। इति हेतोजिनेन्द्रस्य सदोषत्वं प्रसज्यते ॥२१३॥ क्षुधा के बिना आहार नहीं है । दोषों के समूह में क्षुधा मुख्य है। इन सब कारणों से जिनेन्द्र के सदोषत्व प्राप्त होता है। वेदनीयस्य सदभावे बुभुक्षाद्यप्रजायते । तस्मात्केवलिनां भुक्तिनं भवेद्दोषकारिणी ॥२१४॥ वेदनीय के सद्भाव में भूख की इच्छा आदि उत्पन्न होती है । अतः केवली भुक्ति दोषकारिणी नहीं होगी ? दग्धरज्जुसमं वेद्य स्वशक्तिपरिवजितम् । असमर्थ स्वकार्यस्य कर्तृत्वे क्षीणमोहिनि ॥२१॥ वेदनीय जली हुई रस्सी के समान अपनी शक्ति से रहित है । मोह के क्षीण हो जाने पर वह अपने कार्य के करने में असमर्थ है।
SR No.090105
Book TitleBhav Sangrah
Original Sutra AuthorVamdev Acharya
AuthorRamechandra Bijnaur
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages198
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Principle
File Size10 MB
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