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________________ त्यजध्वं कुत्सिताचारं भजध्वं शुद्धसदृशम् । कुरुध्वं गर्हणं निन्दा गृहणीध्वं सद्वतंपुनः ॥१६७॥ कुत्सित (बुरे) आचरण का परित्याग कर दो, शुद्ध आचरण के जो योग्य है, उसका सेवन करो । अपने बुरे कार्यों की गर्दा और निन्दा करो तथा पुन: अच्छे व्रत ग्रहण करो। आकर्पोत्यग्रजः शिष्यो जिनचन्द्रो ब्रवीदिदर । नो शक्यतेऽधुना धतु जिनैराचा'रितं व्रतम् ॥१९८॥ यह बात सुनकर बड़ा शिष्य जिनचन्द्र बोला कि हम जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा प्राचरित धर्म को धारण करने में समर्थ नहीं हैं। ब्रह्मचर्यमचेलत्वं नग्नत्वं स्थितिभोजनम । भूतले शयनं मौनं द्विमासं केशलुञ्चनम् ।।१९६॥ एकस्थानमलाभवं सर्वाङ गमलधारणम् । असह्यान्यन्तरायाणि भिक्षानियतकालिकी ॥२०॥ न शक्या मनसा सोढ़ द्वाविंशतिपरीषहाः। इत्याधनेकधा दुःखमधुना केन सहयते ॥२०१॥ ब्रह्मचर्य, अचेलपना, नग्नपना, खड़े-खड़े भोजन, पृथ्वी पर शयन, मौन, दो मास में केशलुचन, एक स्थान का लाभ न न होना, सर्वाङ्ग में मल धारण करना, असहय अन्तराय, अनियत कालिकी भिक्षा तथा बाईस परीषह मन से भी सहन करने योग्य नहीं है । इस तरह अनेक प्रकार के दुःखों को कौन सहन करेगा? १ राचरित।
SR No.090105
Book TitleBhav Sangrah
Original Sutra AuthorVamdev Acharya
AuthorRamechandra Bijnaur
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages198
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Principle
File Size10 MB
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