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________________ सभी लोग स्वेच्छापूर्वक पंच इन्द्रियों के विषयों का सेवन कैसे करते हैं ? पाषाण स्तम्भ के समान उसकी कर्तृता नहीं मानी गई है। ज्ञानं विना न चारित्रं तद्विना ध्यानसाधनम् । ध्यानं विना कथं मोक्षस्तस्माज्ज्ञानं सतां मतम् ॥१८४॥ ज्ञान के बिना चारित्र नहीं होता है । चारित्र के बिना ध्यान का साधन नहीं होता है। ध्यान के बिना मोक्ष कैसे हो सकता है ? अतः सज्जनों ने ज्ञान को माना है। ततौ भव्यैः समाराध्यं सम्यग्ज्ञानं जिनोदितम् । असाधारण सामग्रयं निःशेषकर्पणां क्षये ॥१८॥ अतः भव्यों को जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा कहे हुए सम्यरज्ञान की आराधना करना चाहिए । समस्त कर्मों के क्षय हो । हो जाने पर यह असाधारण सामग्री है। इत्येवं पंचधा प्रोक्तं मिथ्यात्वं तद्वशाज्जनाः। संसाराब्धौ निमज्जन्ति दुःखकल्लोलसंकुले ॥१८६॥ इस प्रकार मिथ्यात्व पाँच प्रकार का कहा गया है । मिथ्यात्व के वश दुःख रूपी तरंगों से व्याप्त संसार रूपी समुद्र में डूब जाते हैं। ___इत्यज्ञानमिथ्यात्वम् । . . प्रथोर्ध्व स्वमतोद्भूतंमिथ्यात्वं तन्निगधते । विहितं जिनचन्द्रण श्वेताम्बरमताभिधम् ॥१८७॥
SR No.090105
Book TitleBhav Sangrah
Original Sutra AuthorVamdev Acharya
AuthorRamechandra Bijnaur
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages198
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Principle
File Size10 MB
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