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________________ ४१ इस प्रकार वैनयिक नाम का मिथ्यात्व दुर्गति का मार्ग है । उसे छोड़कर रत्नत्रय स्वरूप शिव की अराधना करना चाहिए। इति विनय मिथ्यात्वम् । ज्ञाता हष्टा पदार्थानां त्रैलोक्योदरतिनाम् । तस्याज्ञानस्वभावत्वं ब्र ते सांख्यो निरीश्वरः ॥१७४॥ तीनों लोकों रूपी उदर पदार्थों के ज्ञाता, दृष्टा, आत्मा का स्वभाव निरीश्वर सांख्य अज्ञान स्वभाव वाला कहता है । .. तस्य मतानुसारित्वमड्.गीकृत्य प्रकल्पितम् । मस्करीपूरणनेह वीरनाथस्यसंसदि ॥१७॥ उसके मत का अनुसरण कर मस्करीपूरण ने भगवान् महावीर की सभा में भेद उत्पन्न कर दिया । जिनेन्द्रस्य ध्वनिग्राहिभाजनाभावतस्ततः। शकणात्र समानोतो ब्राह्मणो गौतमाभिधः ॥१७६॥ जिनेन्द्र भगवान् की ध्वनि को ग्रहण करने वाले पात्र के अभाव में इन्द्र गौतम नामक ब्राह्मण को लाया। सद्यः सदीक्षितस्तत्र स ध्वनेः पात्रतां ययौ। लतो देवसभां त्यक्त्वा निर्ययौ मस्करी मुनिः ॥१७७॥ तत्क्षण दीक्षित होकर वह ध्वनि की पात्रता को प्राप्त हो गया । तब मस्करी मुनि देवसभा को त्यागकर चला गया । सन्त्यस्मदादयोऽप्यत्र मुनयः श्रतधारिणः । तांस्त्यक्त्वा स ध्वनेः पात्रमज्ञानी गौतमोऽभवत् ॥१७॥
SR No.090105
Book TitleBhav Sangrah
Original Sutra AuthorVamdev Acharya
AuthorRamechandra Bijnaur
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages198
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Principle
File Size10 MB
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