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________________ १४५ इक्कीस भेद स्वरूप मोक्ष का उपशम और क्षय करने के लिए यह यमी सद्ध्यान करता है । मुख्यवृत्या भवत्यत्र धर्मध्यानं जिनोदितम् । तत्र तावद्भवेद् ध्याता ध्येयं ध्यानं फलं क्रमात् ॥ ६५६॥ मुख्य रूप से यहां जिनोक्त धर्मध्यान होता है । वहां पर क्रम से ध्याता, ध्येय, ध्यान और फल होते हैं । आहारासननिद्राणां विजयो यस्य जायते । पंच. नामिन्द्रियाणां च परीषहसहिष्णुता ॥ ६५७॥ जिसके आहार, आसन, निंद्रा तथा पांच इन्द्रियों पर विजय होती है तथा परिषह सहन होते हैं । गिरीन्द्रsa frosम्पो गम्भीरस्तोयराशिवत् । प्रशेषशास्त्रविद्धोरो ध्याताऽसौ कथ्यते बुधैः ॥ ६५८ ॥ जो पर्वत के समान निष्कम्प होता है, जलराशि (समुद्र) के समान गम्भीर होता है, समस्त शास्त्रों का ज्ञाता और धीर होता है, उसे विद्वान् ध्याता कहते है । यथावद्वस्तुनो रूपं ध्येयं स्यात् संयमसतां (मेशिनां ) । एकाग्रचिन्तनम् ध्यानं चतुर्भेदविराजितम् ॥ ६५६॥ संयम के स्वामियों को वस्तु का यथावत् रूप ध्येय होता है । एकाग्रचिन्तन ध्यान होता है, जो कि चार भेदों से सुशोभित है । पिण्डस्थं च पदस्थं च रूपस्थं रूपवजितम् रूपजतन् प्राद्यत्रयं तु सालम्बमन्त्यमालम्बनोज्झितम् ॥६६०॥
SR No.090105
Book TitleBhav Sangrah
Original Sutra AuthorVamdev Acharya
AuthorRamechandra Bijnaur
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages198
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Principle
File Size10 MB
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