________________
४१
---
-
श्री भक्तामर महामण्डल पूजा --- ...- .
.-.-..- - . . . . . . (विधि) २१ दिन तक प्रतिदिन १००० बार ऋद्धि मंत्र को श्रद्धा माहित जपने से बहत शीघ्र विद्या प्राती है ।।६।।
अर्थ-हे जिनेश ! जिस तरह प्रबोष कोयल वसन्त ऋतु में केवल प्रासमवरी का निमित पाकर मधुर ध्वनि करती है, उसी प्रकार प्रल्पा और विद्वानों के हास्यपात्र मुझे केवल आपको भक्ति ही भापकी स्तुति करने के हेतु जबरन बाचाल कर रही है ॥६॥ ॐ ह्रीं याचितार्थप्रतिपावनशक्तिसहिताय क्लींमहाबोजाक्षरसहिताम
हृदयस्थिताय श्रीवृषभजिनाय अय॑म् ॥६|| Though my lcarning is poor, and I am the butt of ridicule to the learned, yet it is my devotion towards You, which forces me to be vocal. The only cause of the cuckoo's sweet song in the spring-time is indeed the charming mango buds. 6.
सर्वदुरित संकट भोपाव निवारक त्वत्संस्तवेन भव - सन्तति - सनिबद्ध,
पापं क्षणाक्षय - मुपैति • शरीरभाजाम् । माकान्त - लोक - मलिनील - मशेषमाशु,
सूर्या शुभिन्नमिव शार्वर-मन्धकारम् ॥७॥ स्तोत्रेण नाथ ! विलय क्षण मात्रतो यत्
पापं प्रयाति पठतां भवतां नरस्य । मुक्तः सुखं स हि भुनक्ति निवार्य कुष्ट,
पूजां करोमि सतत च ततो जिनस्य ॥७॥ जिनवर की स्तुति करने से, चिर संचित भविजन के पाप । पल भर में भग जाते निश्चित, इधर-उधर अपने ही भाप ।।