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________________ श्री भक्तामर महामण्डल पूजा . अक्षिरोग संहारक सोऽहं तथापि तव भक्तियशान्मुनीश ! कर्तुं स्तवं विगतशक्तिरपि प्रवृत्तः । प्रीत्यात्मवीयमविचार्य भूमी ममेन्द्र, नाभ्येति कि निशिशोः परिपालनार्थम् ॥५॥ मूढोऽप्यहं जिनगुणेषु सदानुरक्तः, भक्ति करोमि मतिहीन उदार-बुद्धया । कार्यस्य सिद्धिमुपयाति सदैब पुण्यात्, तस्माद्यजामि जिनराजपदारविन्दम् ।।५॥ बह में हूँ कुछ शक्ति न रखकर, भक्ति प्रेरणा से लाचार । करता हूँ स्तुति प्रभु तेरी, जिसे न पौर्वापर्य विचार ।। निजशिशु की रक्षार्थ प्रात्म-बल, बिना विचारे क्या न मृगी। जाती है मृगपति के आगे, प्रेम-रंग में हुई रंगो ||५|| (ऋद्धि) ॐ ह्रीं अहं णमो प्रणंसोहिजिणाणं ! ( मंत्र ) ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं की सर्व संकट निवारणेभ्यः सुपाययक्षेभ्यो ममो नमः स्वाहा । (विधि) श्रद्धासहित ७ दिन तक प्रतिदिन ऋद्धिमंत्र का १०.. बार जाप करने से सब तरह के नेत्ररोग-शमन हो जाते हैं। मर्म-हे मुनिनाथ ! से हरिणी शणित न रहते हुये भी केवल प्रेमवश अपने बच्चे की रक्षा के लिये सिंह का सामना करती है। उसी प्रकार में भी बौद्धिकशक्ति न होने पर भी बडामात्र से प्रापका लक्म करने के लिये प्रपत्त मा हूँ ॥५॥ -.
SR No.090095
Book TitleBhaktamara Mahamandal Pooja
Original Sutra AuthorSomsen Acharya
AuthorMohanlal Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages107
LanguageHindi, English
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, & Ritual
File Size1 MB
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