________________
लोक-दृष्टि में श्री भगवान् महावीर
और उनकी शिक्षा
in.
ऋग्वेद में श्री वर्धमान भक्ति
देव बहिवर्धमान सूबोरं स्तीण राये सूभरं वेद्यस्याम् । घृतेनावत्तम् वसवः सीदतेदं विश्वेदेवा प्रादित्याय ज्ञियासः ।।४।।
- ऋग्वेद २-३-४ अर्थात-हे देवों के देव, वर्धमान । आप सुबीर (महावीर) हैं, व्यापक हैं। हम सम्पदाओं की प्राप्ति के लिये इस वेदी पर धत से पापका आह्वाहन करते हैं । इसलिये राब देवता इस यज्ञ में ग्रावें और प्रसन्न होवें।