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________________ समाप्त होता है। इसमे आगे सातवाँ राजू लोक के तलभाग में समाप्त होता है।१५७। (इस प्रकार अधोलोक की ७ राजू ऊंचाई का विभाग है।) ४. रत्नप्रभा पृथ्वी के तीन भागों में से खरभाग १६,००० यो पंक भाग ८४,००० योजन और अबृहल भाग ८०,००० योजन मोटे हैं । दे. रत्नप्रभा/२। ५. लोक में मेरु के तलभाग से उसको चोटी पर्यन्त १००,००० योजन ऊँचा व राजू प्रमाण विस्तार युक्त मध्यलोक है। इतना ही तिर्यक्लोक है। (दे तिर्यच!३/१)। मनुष्यलोक चित्रा पृथ्वी के ऊपर से मेरु की चोटी तक १६००० योजन विस्तार तथा प्रहाई दीप प्रमाण ८५.००.००० योजन विस्तार युक्त है। (दे मनष्य/४) ६ (चित्रा पथ्वी के नीचे खर व पंक भाग में १००,००० यो० तथा चित्रा पृथ्वी के ऊपर मेरु की चोटी तक ६६००० योजन ऊंचा और एक राजप्रमाण विस्तार युक्त भावनलोक है। -दे. लोक/२/९ । इसी प्रकार व्यन्त र लोक भी जानना । दे. लोक/२/१० । चित्रा पृथ्वी से ७६० योजन ऊपर जाकर ११० योजन बाहुल्य व १ राजू विस्तार युक्त ज्योतिष लोक है । दे.ज्योतिष /२/१)। ७. मध्यलोक के ऊपरी भाग से सौधर्म बिमान का ध्वजदण्ड १००,००० योजन कम १३ राजू प्रमाण ऊँचा है। १५८। इसके प्रागे है ११ राज माहेन्द्र व सनत्कुमार स्वर्ग के ऊपरी भाग में, १/२ राजू ब्रह्मोत्तर स्वर्ग के ऊपरी भाग में प्राधा राज कापिष्ठ के ऊपरी भाग में, प्राधा राजू महाशुक्र के ऊपरी भाग में, १२ राजू सहस्रार के ऊपरी भाग में ।१६१। १२ राजू आनत के ऊपरी भाग में और १/२ राज आरण-अच्यूत के ऊपरी भाग में समाप्त हो जाता है । १६१ । उसके ऊपर एक राजू की ऊँचाई में नवयक, नव अनुदिश, और ५ अनत्तरश्मिान हैं। इस प्रकार अवलोक में ७ राजू का विभाग कहा गया ।१६। अपने-अपने अन्तिम इन्द्रक-विमान सम्बन्धी ध्वजदण्ड के अग्रभाग तक उन-उन स्वर्गों का अन्त समझना चाहिये । और कल्पातीत भूमिका जो अन्त है। वही लोक का भी अन्त है । १६३८. (लोकशिखर के नीचे ४२५ धनुष और २१ योजन मात्र जाकर अन्तिम सर्वार्थसिद्धि इन्द्रक स्थित है (दे. स्वर्ग ५/१) सर्वार्थसिद्धि इन्द्रक के वजदण्ड से १२ योजन मात्र ऊपर जाकर अष्टम पृथ्वी है। वह ८ योजन मोटी व एक राज प्रमाण विस्तत है। उसके मध्य ईपत प्रारम्भार क्षेत्र है। वह ४५००,००० योजन विस्तार युवत है। मध्य में ८ योजन और सिरों पर केवल अंगुल प्रमाण मोटा है। इस प्रष्टम पृथ्वी के ऊपर ७०५० धनुष जाकर सिद्धि लोक है दे. मोक्ष/१७) । राज के सातवें भाग को तीन, वः दो, पाँच, एक, चार और सात से गुणा करने पर वंशा आदिक में स्तम्भों के बाहर छोटी भुजाओं के विस्तार का प्रमाण निकलता है। 333 रा० लोक के अन्त तक अब भाग सहित पांच धनराजु और सातवीं पृथ्वी लक ढाई धनराजु प्रमारण घनफल होना है। +४:२४१४७=१३ घनराजु; Ex-२४१४७:: घ० रा० अरची पनी तक वाह्य और आभ्यन्तर दोनों क्षेत्रों का मिन घन फल दो से विभक्त तेरह घगराज प्रमाण है। : २१४७...१३ घरा० छुटवौं पृथ्वी तक जो बाह्य क्षेत्र का धनफल एक बेटे छह (२) धनराजु होता है, उसे उपयुक्त दोनों क्षेत्रों के जोड़ रूप घनफल (13) ० रा में से घटा देने पर शेष एक विभाग (1) सहित छह धनराजु प्रमाण अभ्यन्तर क्षेत्र का धनफल समझना चाहिये। २४x७:. घ. रा० बाह्य क्षेत्र का घनफल; 4. घ. 'रा० अभ्यन्तर क्षेत्र का घनफल । धूमप्रभा पर्यन्त धनवफल का जोड़ साडे तीन घनराजु बतलाया गया है। और पंकप्रभा के अन्तिम भाग तक एक त्रिभाग (3) कम एक धनराज प्रमाण घनफल है । +3:२४१४७.३० रा०+२४२-४७- प० रा. बाह्य क्षेत्र का घन फल । चतुर्थ पृथ्वी पर्यन्त अभ्यन्तर भाग में धनफल का प्रमाण एक बटे छह (2) कम सात धनराज है। +5:२४१४७-3=४० रा. अभ्यन्तर क्षेत्र का बनफल | अर्थ (६) धनराजु को नौ से गुणा करने पर जो गुणफल
SR No.090094
Book TitleBhagavana Mahavira aur unka Tattvadarshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDeshbhushan Aacharya
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1014
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, Principle, & Sermon
File Size36 MB
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