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________________ द्वादशांग बाणी द्विज जोय, गणधर प्रथम होयगो सोय । किहि उपाय वह आवै यहां, यह चिता कोनो उर तहाँ ।।५।। मिथ्यामति धारै अघ दैन, रचे शास्त्र बहु परमत ऐन। कोई न जीत तिहिसों बाद, जग जिय वादहि लहैं विपाद ॥६॥ विद्या गर्व धरै वह धनौ, प्रक्षा कर कछु मद तिहि हनौ । रच्ची काव्य इक अरथ गम्भीर, तव विकल्प हहै द्विजवीर ।७।। शब्द अर्थ शंका जब होइ, मेरे संग प्राय है सोइ । यही विचार विक्रिया शेष, कोनौ वृद्ध विप्रको भेष ।।।। हाथ जटिका टेकत जाय, पदचे तुरन्त विप्र दिग आय । भो गौतम ! तू विद्यापीर, पायौ नाम सुनै तुम तीर ॥ मोगह वर्धमान जिनराय, तिनकी काव्य जू मोहि पढ़ाय । वे तो मौन भये अन्न सही, काव्य अर्थ किहि पूछौं यही ॥१०॥ सो महि दीजै आप बताय, तिहि कारण प्रायौ तुम पाय । काव्य अर्थ नहि धारो मोहि, तो मेरो जीवौ नहि होहि ॥११।। तम तो भव्य परम गुणलीन, पर उपकार करन परवीन । तुम हो देव व्यास जगतात, तुमरो गुण पूरण विख्यात ॥१२॥ जिस प्रकार मेघ जल वष्टि किया करते हैं, उसी प्रकार उस समय देव समूह जिनेन्द्रके चारों ओर पूष्पष्टि कर रहे हो । आकाश से गिरते हए फलों का मनोमोहक सुगन्ध पर भरि आकृष्ट होकर गुजार रहे थे। मानो जगस्वामो जिनेन्ट र र स्वर में गा रहे हों। भगवान के पास ही यथार्थ नामा शाका को दूर करने वाला एक सुन्दर एवं अत्यन्त ऊँचा अशोक वक्ष था। उस प्रशोक वृक्ष के फुल रत्नों के जसे विचित्र वर्ण के ओर अत्यन्त मनोहर थे। वायवेग में TET शाखामों में हिलते हए मरकत मणियों के हरे पत्ते बहुत रमणाय मालूम हो रहे थे। उनके हिलनेसे ऐसा जाना भव्य जीवोंको वे भगवानके पास बुला रहे हो। महावार स्वामोके मस्तकपर तीन श्वेत छन तने रामान लोकों के प्राधिपत्य को पा लिया है, इस बातकी सूचना दे रहे हों। उन छत्रों के चारों ओर चमकीले मोती - - - - तीत काल का कोई बापन नहीं है । लो फिन्तु वहाँ तो छः द्रव्य, नी पदार्थ और तीन काल का कोई बात नहीं का उत्तर तो वही दे सकता है जो सर्वज्ञ हो और जिसे जोरी को द्विराते हुए कहा कि तुम्हें क्या, चलो । मुम्हारे गुरु को ही इसका अर्थ बताता समस्त पदार्थों का पूरा ज्ञान हो। इंदभूति ने अपनी कमजोरी को द्विराते हुए कहा कि तुम्हें क्या चलो। म । उहोंने समवशरण के निकट, मानस्तम्भ देखा तो उनका मान खुदबखुद इस उनके दोनों भाई और पाँचसी शिष्य उनके साथ चल दिये । जब उन्होंने समवशरण के निकट, मानस्तम्भ देखा तो उन नक गर्य को देखकर अंधकार नष्ट हो जाता है। ज्यों-ज्यों बह आगे बढ़ते थे त्यों-त्यों अधिक शान्ति और वीतरागता तरह नष्ट हो गया जिस तरह गूर्य को देखकर अंधकार नष्ट हो जाता है। जा मसारमा की महिमा को देखकर बहू चकित रह गये। महावीर भगवान की बीतरागता से प्रभावित होकर बड़ी विनय अनुभव करते थे। समबद्यारण की महिमा को देखकर वन चकि कार किया। इसके दोनों भाई और पांचसौ चेलों ने जो इद्रभूति से भी अधिक प्रभावित हो चुके थे अपने गुरु को नमस्कार करते हामी भगवान महावीर को नमस्कार किया। पदभूति गौतम ने बड़ी विनय के साथ भगवान महावीर से पळा कि प्रवि नता मनष्य के तो वश का कार्य नहीं है, फिर इसको किराने रचा ? उत्तर में उन्होंने सुना कि उपोतिष देवों के इंद्र चन्द्रमा ने अपने जो भ. महावीर का केवल ज्ञान जानकर अपने राय देवताओं की सहायता से यह समवशरण रचा है। गौतम स्वामी ने कहा र चन्द्रमा नाम के नगर में अंकित नाम का एक साहूकार रहता था। तेईसवें तीर्थकर पार्श्वनाथ भगवान के उपदेश से प्रभावित होकर वह जैन मुनि हो गया और उसने धोर तप किया. जिम TET .जैन मनि हो गया और उसने धोर तप किया, जिसके फल से यह आज स्वर्ग में चन्द्रमा नाम का देव हआ। वहां नवर विदेड क्षेत्र में जन्म लेकर मोक्ष प्राप्त करेगा। भगवान के इसने जबरदात ज्ञान को देखकर कदर पाहारण दान करेगा। भगवान के इसने जबरदस्त ज्ञान को देखकर कट्टर श्राह्मण इन्द्रभूति पर बड़ा प्रभाव पड़ा और * भाईयों का मिथ्यात्व रूपी अंधरा नष्ट हो गया । वह बार-बार उसमूह ब्राह्मण को धन्यवाद देते थे कि जिस की बदौलत बाल उनको सच्चे घर्म और सच्चे ज्ञान का वह अनुपम माग मिला कि जिराको हूँढ़ने के लिये उन्होंने बयों से घर बार और म माग मिला कि जिसको दढ़ने के लिये उन्होंने वर्षों से घर बार छोड़ रखा था। भगवान महावीर के तेज और अनुपम ज्ञान से प्रभावित होकर पन्द्र भूमि गोतम अपने दोनों भाईयों और पांच सौ चेलों महिला हमान तो थे ही, सम्यग्दर्शन की प्राप्ति हो जाने से ये इतने ऊंचे उठे कि बहुत जल्दी भगवान महावीर के सबसे बड़े गणधर (Chief Pontiff) बन गये। उसके भाई और बले भी उस समय के माने हुए विद्वान थे। बता - भाई और चले भी उस समय के माने हुए विद्वान थे। जुनांचे इन्दभूति, उसके दोनों भाई अग्निa Tiस सौ चेलों में से सुधर्म, मौर्य, मोर, मुत्र, मंत्रय, अपन, अघवेल तथा प्रभास ये ११ भी भगवान महावीर के गाधर भूति और वायुभूति तथा पांच सौ चेलों में से सुधर्म, मौर्य, मौण्ड, बन गये। भगवान महावीर को केवल ज्ञान तो ईस्वीय सन से ५५७ वर्ष पहले वैशाख सदी जल जान तो ईस्वीय सन से ५५७ वर्ष पहले वैशाख सुदी दशमी को प्राप्त हो गया, परन्तु उनकी दिव्यध्वनि बमा कागा प्रतिपदा को हुआ था। जिसकी वीर शारान जयन्ती आज तक मनाई ६ दिन बाद खिरने के कारण उनका पहला धर्म उपदेश श्रावण कृष्ण प्रतिपदा को हुआ था। जिसकी जाती है। ४५४
SR No.090094
Book TitleBhagavana Mahavira aur unka Tattvadarshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDeshbhushan Aacharya
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1014
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, Principle, & Sermon
File Size36 MB
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