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________________ ४. नदी कुण्ड द्वीप व पाण्डुक शिला प्रादि त्रि.प. रा.बा ।३।२२ | है.प.। त्रि.सा। ज. प.। अवस्थान ऊंचाई | गहराई : विस्तार ४ागा. वा.।पृ.प. । ५।गा. | गा. | अ.गा. २ कोस २२१ १।१८७।२६ १४३ | नदी कुण्डों के द्वीपगंगा कुण्ड सिन्धु कण्ड शेष कुण्ड युगल १० योः | ८ यो. गंगावत् २११८७।३१ २कोम , उत्तरोत्तर दुना ३।१४।१८८।१८६ विस्तार | मूल | मध्य । ऊपर गंगा कुण्ड १० यो. २२२ ३।१६५ ४यो. यो. | श्यो. | लम्बाई चौड़ाई पाण्डु काशिलादृष्टि सं० १ दृष्टि सं०२ । ८ यो. १०० यो. । ५० यो.. १८१६ ४ यो. । ५०० यो. २५० यो., १८२१ १८०१२० | ४११४२ बिस्तार मल' मध्य ऊपर पाण्डुक शिला के मिहासन व प्रासन ५०० ध. ५ ५घ एक राजु प्रमाण है । यो. ३०००, को २ कम १ रा.। अवधिस्थान इन्द्रक की मर्च और अधस्तन भूमि के बाहल्य का प्रमाण तीन हजार नौ सो निन्यानवें योजन और दो कोस है। ३६EE यो. २ को। धर्मा पृथ्वी में श्रेणीबद्ध बिलों का असराल छह हजार चार सौ निन्यानवे योजन दो कोस और एक कोस के नौ भागों में से पांच भाग प्रमाण है। ६४६६ यो. २१ को। ___ वंशा पृथ्वी में श्रेसी बद्ध वितों का अन्तराल दो हजार नीसो निन्यानवे योजन और तीन हजार छह सी दण्ड प्रमाण है। २६६ यो. ३६०० दण्ड । १५६
SR No.090094
Book TitleBhagavana Mahavira aur unka Tattvadarshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDeshbhushan Aacharya
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1014
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, Principle, & Sermon
File Size36 MB
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