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________________ ६. कुण्डलवर होप ग्यारहवाँ द्वीप कुण्डलबर नाम का है, जिसके बहुमध्य भाग में मानुषोत्तरवत् एक कुण्डलाकार पर्वत है। तहां पूर्वादि प्रत्येक दिशा में चार चार कुट हैं। उनके अभ्यन्तर भाग में अर्थात् मनुष्यलोक की तरफ एक एक सिद्धवर कूट हैं। इस प्रकार इस पर्वत पर कुल २० कट हैं। जिन कूटों के अतिरिक्त प्रत्येक पर अपने-अपने कूटों के नाम वाले देव रहते हैं। मतान्तर की अपेक्षा आठों दिशाओं में एक एक जिनकट हैं। लोक विनिश्चय की अपेक्षा इस पर्वत की पूर्वादि दिशाओं में से प्रत्येक में चार कूट हैं । पूर्व व पश्चिम दिशा वाले कूटों की अग्रभूमि में द्वीप के अधिपति देवों के दो कूट हैं। इन दोनों कूटों के अभ्यन्तर भागों में चारों दिशाओं में एक-एक जिनकट हैं । मतान्तर की अपेक्षा उनके उत्तर व दक्षिण भागों में एक एक जिनकट हैं। ७. रुचकवर द्वीप तेरहवां द्वीप रुचकवर नाम का है। उसमें बीचोंबीच रुचकबर नाम का कुण्डलाकार पर्वत है। इस पर्वत पर फल ४४ कुट है। पूर्वादि प्रत्येक दिशा में पाठ-पाठ कूट हैं जिन पर दिक्कुमारियां देवियां रहती हैं, जो भगवान के जन्म कल्याणक के अवसर पर माता की सेवा में उपस्थित रहती हैं। पूर्वादि दिशाओं वाली आठ-पाठ देवियां कम से भारी क्षण, छत्र. व चवर धारण करती हैं। इन कटों के अभ्यन्तर भाग में चारों दिशारों में चार महाकट हैं तथा इनको भी अभ्यन्तर दिशामा में चार अन्य कूट हैं। जिन पर दिशाएं स्वच्छ करने वाली तथा भगवान का 'जातकर्म करने वाली देवियां रहती हैं। इनके अभ्यन्तर भाग, में चार सिद्धकूट हैं। किन्हीं प्राचार्यों के अनुसार विदिशाओं में भी चार सिद्धकूट है। लोक विनिश्चय के अनुसार पूर्वाद चार दिशाओं में एक-एक करके चार कट हैं जिन पर दिग्गजेन्द्र रहते हैं। इन चारों के अभ्यन्तर भाग में चार दिशायों में पाठ कुट हैं, जिन पर उपरोक्त माता की सेवा करने वालो ३२ दिक्कुमारियां रहती हैं। उनके बीच को विदिशानों में दो-दो करके पाठ कट हैं, जिन पर भगवान् का जातकर्म करने वाली पाठ महत्तरियां रहती हैं। इनके अभ्यन्तर भाग में पुनः पूर्वादि दिशाओं में चार कूट हैं जिन पर दिशाएं निर्मल करने बाली देवियां रहती हैं। इनके अभ्यन्तर भाग में चार सिद्धकूट हैं। (३) (8+३)४८.1(३-१४८) । (१३३४२)x -६४८-१३-२२६x६:-:१४८५ तृ. पृ. का सं. धन इत्यादि। एक कम इष्ट पृथ्वी के इन्द्रक प्रमाण को आधा करके उसका वर्ग करने पर जो प्रमाण हो उसमें मून को जोड़कर आठ से गुणा करे और पांच जोड़ दे । पश्चात् विवक्षित गृथ्वी के इन्द्रक का जो प्रमाण हो उससे गुणा करने पर विवक्षित पृथ्वी का धन अर्थात् इन्द्र के व श्रेणीवद बिलों का प्रमाण निकलता है। विशेपार्थ-- -जैसे प्रथम पृथ्वी के इन्द्रक के प्रमाण १३ में से एक कम करने पर अवशिष्ट १२ के आधे ६ का वर्ग ३६ होता है। इसमें मुल ६ के मिलने पर गोग फल ४२ हुआ। उसको आठ से गुरणा करने पर जो ३३६ गुणनफल होता है, इसमें ५ जोड़कर योगफल ३४१ को प्रथम पृथ्वी के इन्द्रक प्रमाण १३ के गुणा करने पर प्राप्त गुणनफा ४४३३ प्रमारण प्रथम पृथ्वी में इन्द्र क ब श्रेणीवद्ध बिलों का प्रमाण समझना चाहिये। उदाहर x+५४१३:-३६.1-६XF५४ १३:४४३३ प्र. पु. के इन्द्रक व श्रेणी बद्ध। प्रथम पृथ्वी में इन्द्रक और श्रेणीबद्ध बिल चवालीस सौ तेतीस है। और द्वितीय पृथ्वी में दो हजार छह सौ पंचानव इन्द्रक व श्रेणीबद बिल हैं। ४३३३ । २६६५ । तृतीय पृथ्वी में इन्द्रक व श्रेणीबद्ध बिल चौदहतो पचासी, और चौथी पृथ्वी में सात सौ सात हैं । १४८५१ ७०७॥
SR No.090094
Book TitleBhagavana Mahavira aur unka Tattvadarshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDeshbhushan Aacharya
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1014
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, Principle, & Sermon
File Size36 MB
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