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________________ ३. क्षेत्र निर्देश १ जम्बूद्वीप के दक्षिण में प्रथम भरतक्षेत्र जिसके उत्तर में हिमवान पर्वत और तीन दिशाओं में लवण सागर है । इसके बीचों-बीच पूर्वापर लम्बायमन एक विजयार्थ पर्वत है। इस के पूर्व में गंगा और पदिनम में सिंधु नदी बहती हैं। ये दोनों नदियाँ हिमवान के मूल भाग में स्थित गंगा व सिंधु नाम के दो कुडों से निकलकर पृथक्-पृथक् पूर्व व पश्चिम दिशा में उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर बहती हुई विजया को दो गुफा में से निकल कर दक्षिण क्षेत्र के अर्धभाग तक पहुंचकर और पश्चिम की मोर मुड़ जाती हैं । और अपने-अपने समुद्र में गिर जाती हैं। इस प्रकार इन दो नदियों व विजया से विभक्त इस क्षेत्र के छ: खण्ड हो जाते हैं। विजया को दक्षिण के तीन खण्डों में मध्य का खण्ड आर्यखण्ड है और शेष पांच वण्ड मलेच्छ खण्ड हैं । आर्यखण्ड के मध्य (१२x६) योजन विस्तृत विनीता या अयोध्या नाम की प्रधान नगरी है। जो चक्रवर्ती की राजधानी होती है। विजया के उत्तर वाले तीन खण्डों में मध्य वाले मलेच्छ खण्ड के बीचों बीच वृषभगिरि नाम का एक गोल पर्वत है जिस पर दिग्विजय करने पर चक्रवर्ती अपना नाम अंकित करता है। इसके पश्चात हिमकान के उतर जपा महादिमाशन के हसिम में दूसरा हेमवत क्षेत्र है। इसके बहुमध्य भाग में एक गोल शब्द नाम का नाभिगिरि पर्वत है। इस क्षेत्र के पूर्व में रोहित और पश्चिम में रोहितास्या नदियां बहती हैं। ये दोनों ही नदियां नाभिगिरि के उत्तर व दक्षिण में उससे दो कोश परे रहकर ही उसको प्रदक्षिणा देतो हुई अपनी-अपनी दिशामों में मड़ जाती हैं और अन्त में अपनी-अपनो दिशा वाले सागर में गिर जाती हैं। इसके पश्चात् महाहिमवान के उत्तर तथा निषध पर्वत के दक्षिण में तीसरा हरिक्षेत्र है । नोल' के उत्तर में ओर रुक्मि पर्वत के दक्षिण में छठा हैरण्यवत् पांचवां रम्यक् क्षेत्र है पुनः रुक्मि के उत्तर व शिखरी पर्वत के दक्षिण में क्षेत्र है तहां विदेह क्षेत्र को छोड़कर इन चारों का कथन हेमवत् के समान है । केबल नदियों व नाभिगिरि पर्वत के नाम भिन्न हैं। निषध पर्वत के उत्तर व नील पर्वत के दक्षिण में विदेह क्षेत्र स्थित है। इस क्षेत्र को दिशाओं का यह विभाग भरत क्षेत्र की अपेक्षा है सूर्योदय की अपेक्षा नहीं क्योंकि वहाँ इन दोनों दिशानों में सूर्य का उदय व अस्त दिखाई देता है। इसके बहमध्य भाग में सुमेरू पर्वत है। ये क्षेत्र दो भागों में विभक्त हैं। कुरुक्षेत्र व विदेह । मेरू पर्वत को दक्षिण व निषध के उत्तर में देव कुरू है। मेरू के उत्तर व नील के दक्षिण में उत्तर कुरू है। मेरू के पूर्व व पश्चिम भाग में पूर्व व अपर विदेह हैं। जिनमें पृथक-पृथक् सोलह-सोलह क्षेत्र है। जिन्हें ३२ विदेह कहते हैं। सबसे अन्त में शिखरी पर्वत के उत्तर में तीन तरफ लम्बाई और मा हजार योजन वाहत्व वाला प्रथम पृथ्वी का बातरुद्र क्षेत्र है। इसका घनकाल अपने बाल्य अर्थात साठ हजार योजन के सातवें भाग हिल्य प्रमाण जगप्रतर होता है । १४७४६००००x४६४६x६००० दुसरी पृथ्वी के अधस्तन भाग में वातरुद्ध क्षेत्र के घनफन को कहते हैं सातवें भाग कम दो राजु विष्कम्भवाला, सात राजु आदत और साठ हजार योजन बाल्प वाला द्वितीय पृथ्वी का वातरुद्ध क्षेत्र है। उसका घनफल मात लाख अस्सी हजार योजन के उन्नचासर्व भाग दाहल्यप्रमाण जगप्रतर होता है। १.१३.६०००० _७४७८००००४७७८००००x४ 550१७४७ तीसरी पृथ्वी के अघस्तन भाग में वातरुद्ध क्षेत्र के अनफल को कहते हैं-दो बटे सात भाग (3) कम तीन राजु विष्कम्भयुक्त, सात राजु लम्बा और साठ हजार योजन बाल वाना तृतीय पृथ्वी का वातरुद्ध क्षेत्र है। इसका घनफल ग्यारह लाख चालीस हजार योजन के उन्नचासवें भाग वाहत्य प्रमाण जगततर होता है। { १९६0000_.७X११४००००४७_११४०००० X ४६ ४६ चौथी पृथ्वी के अघस्तन भाग में यालरुद्ध क्षेत्र के घनफल को कहते हैं-चतुर्थ पृथ्वी का वातावद्ध क्षेत्र तीन वटे सात भाग (3)
SR No.090094
Book TitleBhagavana Mahavira aur unka Tattvadarshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDeshbhushan Aacharya
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1014
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, Principle, & Sermon
File Size36 MB
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