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________________ 479 479 480 482 484 486 दुबारा शुक्र के मृगवीथि में पहुँचने का फल अजवीथि की पुन: प्राप्ति का कथन जरद्गव, गोवीथि, ऐरावणवीथि, नागवीथि की पुन: प्राप्ति का कथन वीथियों में शुक्र के अस्त होने के पश्चात् पुनः प्राप्ति का समय शुक्र के वर्णों का फल शुक्र के चार, वक्र, उदय, अतिचार आदि का कथन शुक्रोदय का विचार शुक्रास्त का विशेष विचार शुक्र की वीथियों का विस्तृत कथन शुक्र के छहों मण्डलों का कथन तथा उनका विस्तृत फल शुक्र के उदयास्त का विशेष फल षोडश अध्याय 487 488 489 491 492 495-509 495 495 497 497 497 498 498 शनिचार के वर्णन की प्रतिज्ञा दक्षिण मार्ग में शनि के अस्त होने का समय प्रमाण शनि के दो नक्षत्र प्रमाण गमन करने का फल शनि के तीन या चार नक्षत्र प्रमाण गमन का फल उत्तर मार्ग में वर्ण के अनुसार शनि का फल मध्यमार्ग में शनि के उदयास्त का फल शनि के दक्षिण मार्ग में गगन करने का फल शनि की प्रदक्षिणा का फल शनि के अपसव्य मार्ग में गमन करने का फल शनि पर चन्द्र परिवेष का फल चन्द्रमा और शनि के एक साथ होने का फल शनि के वेध का फल शनि के कृत्तिका और गुरु के विशाखा नक्षत्र पर रहने का फल श्वेत रंग के शनि का फल 499 499 500 301 SO1 502 502
SR No.090074
Book TitleBhadrabahu Sanhita Part 2
Original Sutra AuthorBhadrabahuswami
AuthorKunthusagar Maharaj
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1268
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Jyotish
File Size28 MB
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