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________________ भद्रबाहु संहिता ६०८ महाकेतुश्च ताप तुगान् केतुवानः । उल्काशिखश्च जाज्वल्यः प्रज्वाली चाम्बरीषकः॥४५॥ (महाकेतुश्च) महाकेतु और (श्वेतश्च) श्वेत (केतुमान्) केतुमान (केतुवाहनः) केतु वाहन (उल्काशिखश्च) उल्काशिख, (जाज्वल्य:) जाज्वल्य (प्रज्वाली) प्रज्वाल (चाम्बरीषक:) और अम्बरीषेक। भावार्थ-महाकेतु, श्वेतकेतु, केतुवाहन, उल्काशिख, जाज्वल्य, प्रज्वाली, अम्बरीषेक॥४५॥ हेन्द्रस्वरो हेन्द्रकेतुः शुक्लवासोऽन्यदन्तकः। विधुत्समो विद्युल्लता विद्युद् विद्युत्स्फुलिङ्गकः॥४६॥ (हेन्द्रस्वरो) हेन्द्रसार (हेन्द्रकेतुः) हेन्द्रकेतु (शुक्लवासो) शुक्लवास, (अन्यदन्तकः) अन्य दन्तक (विद्युत्समो) विद्युत्सम (विद्युल्लता) विद्युल्लता, (विद्युद् विद्युत्स्फुलिङ्गक:विद्युद, विद्युत्स्फुलिङ्ग। भावार्थ-हेन्द्रश्वर, हेन्द्रकेतु, शुक्लवास, अन्यदन्तक, विद्युतसम्, विद्यल्लता, विद्युद् विद्युत्स्फुलिङ्ग ।। ४६॥ चिक्षणो झरुणो गुल्म: कबन्धो ज्वलिताङ्करः । तालीशः कनकश्चैव विक्रान्तो मांसरोहितः ।। ४७॥ (चिक्षणो) चिक्षणो (ह्यरुणो) ह्यरुण (गुल्म) गुल्म (कबन्धोज्वलिताङ्कुरः) कबन्ध, ज्वलितां वर (तालिश:) तालिश (कनकश्चैव) कनक और (विक्रान्तो) विक्रान्त (मांसरोहित:) मांसरोहित। भावार्थ-चिक्षण, ह्यरुण, गुल्म कबन्ध, ज्वलितांकुर, तालिश, कनक, विक्रान्त और मांसरोहित ।। ४७ ।। वैवस्वतो धूममाली महार्चिश्च विधूमितः। दारुणाः केतवो झेते भयमिच्छन्ति दारुणम्।। ४८॥ (वैवस्वतो) वैवस्वत (धूममाली) धूममाली (महार्चिश्च) महार्चि (विधूमितः) विधूमित (दारुणा: केतवो ते) ये सब केतु दारुण है (भयमिच्छन्तिदारुणम्) और महान् भय को चाहते हैं।
SR No.090074
Book TitleBhadrabahu Sanhita Part 2
Original Sutra AuthorBhadrabahuswami
AuthorKunthusagar Maharaj
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1268
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Jyotish
File Size28 MB
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