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________________ भद्रबाहु संहिता | बंगाल और आसाम में अन्न की कमी रहती है, दुष्काल के कारण सहस्रों व्यक्ति भूखसे छटपटाकर अपने प्राण छोड़ देते हैं। कन्याराशि का राहु होने से विश्व में शान्ति होती है। अन्न और वस्त्र का अभाव दूर हो जाता है। लौंग, पीपल, इलायची और काली मिर्च के व्यवसाय में मनमाना लाभ होता है। जब कन्या राशि का राहु आरम्भ हो उस समयसे लेकर पाँच महीनों तक उक्त पदार्थों का संग्रह करना चाहिए, पश्चात् छठवें महीने में उन पदार्थों को बेच देने से अधिक लाभ होता है। चीनी, गुड़, घी और नमक के व्यवसाय में भी साधारण लाभ होता है। सोने, चाँदी के व्यापार में कन्या के राहु के छ: महीने के पश्चात् लाभ होता है। जापान, जर्मनी, अमेरिका, इंग्लैण्ड, चीन, रूस, मिस्र, इटली आदि देशों में खाद्यान्नों की साधारण कमी होती है। बर्मा में भी अन्न की कमी हो जाती है। सिंह राशि का राहु होने से सुभिक्ष होता है। सोंठ, धनिया, हल्दी, काली मिर्च, सेंधा नमक, पीपल आदि वस्तुओं के व्यापार में लाभ होता है। अन्न के व्यवसाय में हानि होती है। गुड़, चीनी और घी के व्यवसाय में समर्घता रहती है। तेल का भाव तेज हो जाता है। सिंह का राहु जनशिक स्थिति से जुड़करता है। देश में नये भाव और नये विचारों की प्रगति होती है। कलाकारों को सम्मान प्राप्त होता है तथा कला का सर्वाङ्गीण विकास होता है। साहित्य की उन्नति होती है। सभी देश शिक्षा और संस्कृति में प्रगति करते हैं। कर्क राशि के राहु में सोना, चाँदी, ताँबा, लोहा, गेहूँ, चना, ज्वार, बाजारा आदि पदार्थ सस्ते होते हैं तथा सुभिक्ष और सुवृष्टि होती है। जनता में सुख-शान्ति रहती है। यदि कर्क राशि के राहु के साथ गुरु हो तो राजनैतिक प्रगति होती है। देश का स्थान अन्य देशों के बीच श्रेष्ठ माना जाता है। पंजाब, बिहार, बंगाल, बम्बई, मध्य भारत, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, दिल्ली और हिमाचल प्रदेश के लिए यह राहू बहुत अच्छा है, इन स्थानों में वर्षा और फसल दोनों ही उत्तम होती है। आसाम में बाढ़ आने के कारण अनेक प्रकार की कठिनाइयों उत्पन्न होती हैं। जूट के व्यापार में साधारण लाभ होता है। जापान में फसल बहुत अच्छी होती हैं; किन्तु भूकम्प आने का भय सर्वदा बना रहता है। कर्क राशि का राहु चीन और रूस के लिए उत्तम नहीं है, अवशेष सभी राष्ट्रों के लिए उत्तम है। मिथुन राशि के राहु में भी सभी पदार्थ सस्ते होते हैं। अन्नादि पदार्थों की उत्पत्ति भी अच्छी होती है। तथा सभी देशों में सुकाल रहता है। वृषराशि
SR No.090074
Book TitleBhadrabahu Sanhita Part 2
Original Sutra AuthorBhadrabahuswami
AuthorKunthusagar Maharaj
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1268
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Jyotish
File Size28 MB
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