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________________ विंशतितमोऽध्यायः राहु संचार का वर्णन राहुचारं प्रवक्ष्यामि क्षेमाय च सुखाय च। द्वादशाङ्गविद्भिः प्रोक्तं निर्ग्रन्थैस्तत्त्वस्वेदिभिः ॥ १ ॥ (राहुचारं प्रवक्ष्यामि) अब मैं राहुके संचार को कहूँगा (क्षेमाय च सुखाय च) जो क्षेम के लिये और सुख के लिये है ( द्वादशात्र विद्भिः प्रोक्तं ) जिसको द्वादशान के ज्ञाता (निर्ग्रन्थैः तत्त्ववेदिभिः) निर्ग्रन्थ तत्त्व ज्ञान के ज्ञाताओं ने कहा है। भावार्थ -- अब में राहुचार को कहूँगा जो क्षेम और सुख के लिए है, जिसको द्वादशाङ्ग के ज्ञाता निर्ग्रन्थगुरु तत्त्वज्ञानियों ने कहा है ॥ १ ॥ श्वेतो रक्तश्च पीतश्च विवर्ण: कृष्ण एव च । ब्राह्मण क्षत्र वैश्यानां विजाति शूद्रयोर्मतः ॥ २ ॥ वह राहु (श्वेतो) सफेद (रक्तश्च) लाल और ( पीतश्च) पीला (विवर्णः ) विवर्ण (कृष्ण एव च ) और काला वह क्रमश: (ब्राह्मणक्षत्रवैश्यानां) ब्राह्मण, क्षत्रियों, वैश्यों और (विजातिशूद्रयोर्मतः ) विजाति और शूद्रों के लिये शुभाशुभ करता है। भावार्थ- वह राहु सफेद लाल, पीला, विवर्ण और काला है, और क्रमशः ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र विजातियों के लिये शुभाशुभ करता है || २ | षण्मासान् प्रकृति ज्ञेया ग्रहणं वार्षिकं भयम् । त्रयोदशानां मासानां पुररोधं समादिशेत् ॥ ३ ॥ राहु की प्रकृति ( षण्मासान् प्रकृति ज्ञेया) छह महीने के अन्दर जानना चाहिये की (ग्रहणं ) ग्रहण करेगा, (वार्षिकं भयम्) एक वर्ष में भय करेगा, (त्रयोदशानां मासानां) तेरह महीनोंके अन्तर (पुरोधं समादिशेत् ) नगर का रोध होगा । भावार्थ – राहु की प्रकृति छह महीने में ग्रहण और बारह महिने में भय, तेरह महीने में नगर रोध करती है। ॥ ३ ॥
SR No.090074
Book TitleBhadrabahu Sanhita Part 2
Original Sutra AuthorBhadrabahuswami
AuthorKunthusagar Maharaj
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1268
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Jyotish
File Size28 MB
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