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________________ भद्रबाहु संहिता भावार्थ — जिसके जन्म नक्षत्र का राहु चन्द्र का ग्रहण करे उसको रोग होगा, मृत्यु भय होगा इसमें कोई सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ९४ ॥ क्रूर ग्रहयुतश्चन्द्रो गृह्यते दृश्यतेऽपि वा । यदा क्षुभ्यन्ति सामन्ता राजा राष्ट्रं च पीड्यते ॥ ९५ ॥ ( यदा) जब ( क्रूरग्रहयुतश्चन्द्रो ) चन्द्र को क्रूर ग्रह युक्त होकर (गृह्यते दृश्यतेऽपि वा) ग्रहण करते हुऐ दिखाई दे तो भी ( राजा सामन्ता क्षुभ्यन्ति) राजा और सामन्त शोभित होते है (च) और (राष्ट्र पीड्यते) देश को पीड़ा देता है। भावार्थ --- जब क्रूर ग्रहों के द्वारा राहु चन्द्रमा को ग्रहण करता हुआ दिखाई दे तो समझो राजा व सामान्त पीड़ित होंगे, और देश को पीड़ा होगी ॥ ९५ ॥ लिखेत सोमः शृङ्गेन भौमं शुक्रं गुरुं यथा । शनैश्नां नाभिकृतं षड्भयानि तदादिशेत् ॥ ९६ ॥ ३७६ ( यथा ) जैसे (सोम: शृंङ्गन्) चन्द्रमा के श्रृंग द्वारा (भौमं, शुक्रं, गुरुं) मंगल, शुक्र, गुरु का ( लिखेत्) स्पर्श करता हो ( शनैश्चरं चाधिकृतं ) शनि अधीन हो रहा हो तो (तदा) तब (षड्भयानि दिशेत् ) छह प्रकार के भय होते हैं। भावार्थ — जैसे चन्द्रमा के श्रृंग द्वारा मंगल, शुक्र, गुरु स्पर्शित हो रहे हो और शनि अधीन दिखता हो तो वहाँ पर छह भय उपस्थित होंगे ॥ ९७ ॥ यदा बृहस्पति: शुक्रं भिद्येदथ पुरोहितास्तदाऽमात्याः प्राप्नुवन्ति विशेषतः । महद्भयम् ॥ ९७ ॥ जन (बृहस्पतिः) गुरु (शुक्रं ) शुक्र का (भिद्येदथ विशेषतः) विशेषता भेदन करे तो ( तदाः ) तब ( पुरोहिता: अमात्याः) मन्त्री पुरोहित को (महद्भयम् प्राप्नुवन्ति ) महान् भय उत्पन्न होगा | भावार्थ--- -- जब गुरु शुक्र को विशेष रीति से घाते तो पुरोहित व मन्त्री को महान् भय उत्पन्न करेगा ॥ ९७ ॥ ग्रहाः परस्परं यत्र भिन्दन्ति प्रविशन्ति वा । तत्र शस्त्र वाणिज्यानि विन्द्यादर्थ विपर्ययम् ॥ ९८ ॥ ( यत्र ) जहाँ पर ( ग्रहाः परस्परं ) ग्रह परस्पर ( भिदन्दन्ति प्रविशन्ति वा ) भेदन
SR No.090074
Book TitleBhadrabahu Sanhita Part 2
Original Sutra AuthorBhadrabahuswami
AuthorKunthusagar Maharaj
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1268
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Jyotish
File Size28 MB
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