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________________ २११ दशमोऽध्यायः होती है। गाय बैल आदि मवेशीको भी चावल खानेको मिलते हैं। चावलका भाव भी सस्ता रहता है। गेहूँ, जौ और चनाकी फसल भी साधारणतः उत्तम होती है। चनेका भाव अन्य अनाजोंकी अपेक्षा महँगा रहता है तथा दालवाले सभी अनाज महँगे होते हैं। यद्यपि इन अनाजोंकी उत्पत्ति भी अधिक होती है फिर भी इनका मूल्य वृद्धिंगत होता है। उत्तराषाढा नक्षत्रमें प्रथम वर्षा हो तो अच्छी वर्षा होती है तथा हवा भी तेजीसे चलती है। इस नक्षत्रमें वर्षा होनेसे चैत्रवाली फसल बहुत अच्छी होती है अगहनी धान भी अच्छा होता है; किन्तु कार्तिकी अनाज कम उत्पन्न होते हैं। नदियोंमें बाढ़ आती है, जिससे जनताको अनेक प्रकारके कष्ट सहन करने पड़ते हैं । भाद्रपद और पौषमें हवा चलती है, जिससे फसलको भी क्षति होती है। श्रावण नक्षत्रमें प्रथम वर्षा हो तो कार्तिकमासमें जलका अभाव और अवशेष महीनोंमें जलकी वर्षा अच्छी होती हैं। भाद्रपदमें अच्छा जल बरसता है, जिससे धान, मकई, ज्वार और बाजराकी फसलें भी अच्छी होती है। आश्विनमें जलकी वर्षा शुक्ल पक्षमें होती है जिससे फसल अच्छी हो जाती है। गेहूँ में एक प्रकारका कोड़ा लगता है, जिससे इसकी फसल क्षति उठानी पड़ती है। उत्तम प्रकारकी वर्षा आश्विन, कार्त्तिक और चैत्रके महीनों में रोगोंकी सूचना भी देती हैं। छोटे बच्चोंको अनेक प्रकारके रोग होते हैं। स्त्रियोंके लिए यह वर्षा उत्तम है, उनका सम्मान बढ़ता है तथा वे सब प्रकारसे शान्ति प्राप्त करती हैं। धनिष्ठा नक्षत्रमें जलकी प्रथम वर्षा होने पर पानी श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, माघ और वैशाखमें खूब बरसता है। फसल कहीं-कहीं अतिवृष्टिके कारण नष्ट भी हो जाती है। आर्थिक दृष्टिसे उक्त प्रकारकी वर्षा अच्छी होती है। देशके वैभवका भी विकास होता है। यदि गर्जन तर्जनके साथ उक्त नक्षत्रमें वर्षा हो तो उपर्युक्त फलका चतुर्थांश फल कम समझना चाहिए। व्यापारके लिए भी उक्त प्रकारकी वर्षा मध्यम है । यद्यपि विदेशों से व्यापारिक सम्बन्ध बढ़ता है तथा प्रत्यके वस्तुके व्यापारमें लाभ होता है । धनिष्ठा नक्षत्रके आरम्भमें ही जलकी वर्षा हो तो फसल उत्तम और अन्तिम न घटियोंमें जल बरसे तो साधारण फल होता है और वर्षा भी मध्यम ही होती है। शतभिषा नक्षत्रमें जलकी प्रथम वर्षा हो तो बहुत पानी बरसता है। अगहनी फसल मध्यम होती है, पर चैती फसल अच्छी उपजती है। व्यापारमें हानि उठानी पड़ती है, जूट
SR No.090074
Book TitleBhadrabahu Sanhita Part 2
Original Sutra AuthorBhadrabahuswami
AuthorKunthusagar Maharaj
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1268
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Jyotish
File Size28 MB
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