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________________ प्रस्तावना दुरात्मा साधु कहे जानेके योग्य नहीं हैं । ऐसे असाधु 'अमुक दाताने उत्तम भोजन दिया तथा अमुक दाताने निष्कृष्ट भोजन दिया' इत्यादि प्रकारसे दाताकी प्रशंसा और निन्दा भी किया करते हैं तथा कभी कभी वे अपने योग्य व्यवस्थाके न बननेसे उस दाताके ऊपर रुष्ट भी हो जाते हैं। उनकी इस दुष्प्रवृत्तिको आचार्यने कलिकालका प्रभाव बतलाया है (१५८-५९) । मनका नियन्त्रण संयमरूप राज्यके संरक्षणार्थ जिस प्रकार बाह्य शत्रुओंको जीतना आवश्यक है उसी प्रकार अन्तरंग शत्रुओंको भी जीतना अत्यावश्यक है। जिस प्रकार बुद्धिमान् राजा अपने राज्यके विरुद्ध आचरण करनेवाले बाह्य शत्रुस्यरूप अन्य राजाओं आदिको वशमें रखता है उसी प्रकार वह उसके अन्तरंग शत्रुस्वरूप काम-क्रोधादिको भी अवश्य वशमें रखता है, क्योंकि, इसके विना उसका राज्य कभी स्थिर नहीं रह सकता है। इसी प्रकार विवेकी साधु भी अपने संयमको सुरक्षित रखने के लिये जैसे बाह्य शत्रुस्वरूप आरम्भपरिग्रहादिको नष्ट करता है वैसे ही वह अन्तरंग शत्रुस्वरूप राग - द्वेषादिको भी अवश्य नष्ट करता है। कारण यह कि इसके विना उसका संयम कभी सुरक्षित नहीं रह सकता है (१६९) । परन्तु यह तब ही सम्भव है जब कि वह अपने मनको आत्मनियन्त्रणमें कर लेता है। ___ यह मन बन्दरके समान चपल है । अतएव उसे आत्मनियन्त्रणमें रखनेके लिये श्रुतरूप वृक्षके ऊपर रमाना चाहिये। कारण कि जिस प्रकार बन्दर अनेक शाखाओंसे संयुक्त व फल-फूलोंसे परिपूर्ण किसी वृक्षको पाकर वहींपर मैं डामें रत हो जाता है और उपद्रव करना छोड देता है इसी प्रकार इस मनको भी यदि अनेक नयोंके आश्रयसे अनेकान्तात्मक बस्तुस्वरूपका विवेचन करनेवाले आगमके चिन्तनमें लगाया जाता है तो वह भी उसमें निरत होकर दुनिको छोड देता है (१७०) । यहां प्रसंग पाकर श्री गुणभद्राचार्यने उस आगमोक्त वस्तुतत्त्वका भी कुछ विवेचन किया है । वे सांख्य, बौद्ध, विज्ञानाद्वैतवादी और शून्यकान्तवादियोंके द्वारा परिकल्पित वस्तुस्वरूपको ध्यानमें रखकर कहते हैं कि
SR No.090070
Book TitleAtmanushasanam
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorA N Upadhye, Hiralal Jain, Balchandra Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year2004
Total Pages366
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Spiritual, Sermon, & Religion
File Size28 MB
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