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________________ -१४४] दोषोद्भावनं मतिमतां प्रीतये भवति १३७ लोकद्वयहितं वक्तुं श्रोतुं च सुलभाः पुरा । दुर्लभाः कर्तुमद्यत्वे वक्तुं श्रोतुं च दुर्लभाः॥१४३॥ गुणागुणविवेकिर्मिविहितमप्यलं दूषणं भवेत् सदुपदेशवन्मतिमतामतिप्रीतये । कृतं किमपि धाष्टर्यतः स्तवनमप्यतीर्थोषितैः न तोषयति तन्मनांसि खलु कष्टमझानता ॥ १४४ ॥ प्राणिनाः इत्याह-- लोकेत्यादि । लोकद्वयहितं इहलोकपरलोकोपकारकम् । अद्यत्वे इदानींतनकाले ॥ १४३ ॥ ननु लोकद्वयहितं ब्रुवाणः परेषां दोषान् प्रतिपाद्य ततो व्यावृत्ति: कारयितव्या तथाचानिष्टप्रसंगान किंचित्सन्मार्गे प्रवर्तते इत्याशङ्कां निराकुर्वन्नाह- गुणेत्यादि । विहितम् उद्भावितम् । दूषणमपि किंचित् । धाष्टर्यतः धृष्टत्वमवलम्ब्य । अतीर्थोषितैः आगमानभिज्ञैः। तन्मनांसि मतिमतां मनांसि ॥१४४ ॥ उद्भाविते च दूषणे दोषदर्शनात्यागो गुणदर्शनाच्योपादानं प्रज्ञावतां। कर्तव्यमित्याह-- त्यक्तेत्यादि । गुणदोषदर्शनलक्षणा करनेके लिये तथा उसे सुनने के लिये भी बहुतसे जन सरलतासे उपलब्ध होते थे, परन्तु तदनुकूल आचरण करनेके लिये उस समय भी बहुत जन दुर्लभ ही थे। किन्तु वर्तमानमें तो उक्त धर्मका व्याख्यान करनेके लिये और सुननेके लिये भी मनुष्य दुर्लभ हैं, फिर उसका आचरण करनेवाले तो दूर ही रहे ॥ १४३ ॥ जो गुण और दोषका विचार करनेवाले सज्जन हैं वे यदि कदाचित् किसी दोषको भी अतिशय प्रगट करते हैं तो वह बुद्धिमान् मनुष्योंके लिये उत्तम उपदेशके समान अत्यन्त प्रीतिका कारण होता है। परन्तु जो आगमज्ञानसे रहित हैं ऐसे अविवेकी जनोंके द्वारा यदि धृष्टतासे कुछ प्रशंसा भी की जाती है तो वह उन बुद्धिमान् मनुष्योंके मनको सन्तुष्ट नहीं करती है। निश्चयसे वह अज्ञानता ही दुःखदायक है ॥ १४४ ॥ जो अन्य कारणोंको अपेक्षा न करके केवल गुणके कारण किसी वस्तु (सम्यग्दनादि) को ग्रहण करता है और दोष के कारण उसका (मिथ्यात्व 1 ज स प्रेक्षवतां । . - -
SR No.090070
Book TitleAtmanushasanam
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorA N Upadhye, Hiralal Jain, Balchandra Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year2004
Total Pages366
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Spiritual, Sermon, & Religion
File Size28 MB
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