SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 207
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ आत्मानुशासनम् [श्लो० ९७शरीरेऽस्मिन् सर्वाशुचिनि बहुदुःखेऽपि निवसन् व्यरंसीनो नैव प्रथयति जनः प्रीतिमधिकाम् । इदं दृष्ट्वाप्यस्माद्विरमयितुमेनं च यतते यतिर्याताख्यानः परहितरति पश्य महतः ॥ ९७॥ प्रदर्शयतो मुनेः न किंचित्फलाभिलाषित्वमस्ति, परोपकारार्थमेव तत्प्रवृत्तेः, 'परोपकाराय सतां हि चेष्टितम्' इति वचनात् । एतदेव दर्शयन्नाह- शरीरेत्यादि । अस्मिन् औदारिके शरीरे । सर्वाशुचिनि सर्वम् अशुचि अपवित्रं यस्मिन् । बहुदुःखें बहूनि शारीर-मानसादीनि दुःखानि यस्मिन् । इत्थंभूतेऽपि काये वसन् जनः । व्यरंसीनो वैराम्यं गतवान् नैव । नैवेत्यादि काक्वा व्याख्यानम्- इदं शरीरं दृष्टवा जनः प्रीतिम् अधिकां नैव प्रथयति किम् । अपि तु प्रश्यत्येव । इमाम् इति पाठे काक्वा व्याख्यानं न कर्तव्यम् । दृष्ट्वा मुनिम् । जनाः प्रीति प्रमोदम् । अधिकां विशिष्टाम् । प्रथयति करोति । नव नापि । एनं च जनम् । पुनः यतिः अस्मात शरीरात् । विरमयितुं निवर्तयितुं यतते प्रयत्नं करोति। कैः कृत्वा । याताख्यान: ज्ञातसारोपदेशः ।। ९७ ।। कस्मात् न निवर्तते जनः । तं जनं याताख्यान: मुनिः जो शरीर सब प्रकारसे अपवित्र और बहुत दुःखोंको उत्पन्न करनेवाला है ऐसे इस शरीरमें रहनेवाला प्राणी उससे विरक्त नहीं होता है, बल्कि वह उक्त शरीरको देख करके भी उससे अधिक प्रीति नहीं करता हो सो बात नहीं, किन्तु अधिक ही प्रीति करता है । उसको हितैषी मुनि श्रेष्ठ उपदेशोंके द्वारा इस अपवित्र शरीरसे विरक्त करनेके लिये प्रयत्न करते हैं। ऐसे महापुरुषोंका दूसरोंके हितविषयक अनुराग देखने योग्य है-प्रशंसनीय है । विशेषार्थ- यह शरीर अतिशय अपवित्र एवं तीव्र दुःखोंका कारण है। फिर भी अज्ञानी प्राणी उससे अनुराग करना नहीं छोडता है । इतना ही नहीं, बल्कि वह उत्तरोत्तर 'उसमें अधिक ही आसक्त होता है। यह देखकर दयालु साधु उसे अनेक प्रकारसे समझा करके उससे विरक्त करनेका निरन्तर प्रयत्न करते हैं। दूसरे प्राणियोंके कल्याणमें निरत रहना यह महात्माओंका स्वभाव ही हुआ करता है । ऐसे साधु पुरुषोंका समागम दुर्लभ है। संसारमें एसे निकृष्ट जन ही अधिक देखे जाते हैं जो दूसरोंके साथ मधुर भाषण करके उन्हें धोखा देनेमें उद्यत रहते हैं ।।९७।। । म (ज.) इमां (नि.) इमं ।
SR No.090070
Book TitleAtmanushasanam
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorA N Upadhye, Hiralal Jain, Balchandra Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year2004
Total Pages366
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Spiritual, Sermon, & Religion
File Size28 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy