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________________ विनेयभयोत्सारणम् । यद्यपि कदाचिदस्मिन् विपाकमधुरं तदात्वकटु किंचित् । त्वं तस्मान्मा भैषीर्यथातुरो भेषजादुग्रात् ॥३॥ जना घनाश्च वाचालाः सुलभाः स्युर्वथोत्थिताः। दुर्लभा द्वन्तरास्तेि जगदभ्युज्जिहीर्षवः ॥४॥ यतो दुःखापहारि दुःखस्फेटकं सुखकरं च ॥२.। तच्च यद्यपि कदाचित्तदात्वकटु तथापि तत्तो मा भैषीस्त्वम् इत्याह- यद्यपीत्यादि । अस्मिन् शास्त्रे । कदाचित् कस्मिश्चित् प्रघट्टके प्रतिपाद्यमानं किंचित् सम्यग्दर्शनादि । तदास्वकटु किंचित् प्रतिपाधं प्रतिपादनकाले अनुष्ठानकाले च दु:खदम् । यद्यपि । विपाकमधुरं फलानुभवनकाले सुखदम् । तस्मात् तदात्वकटुकात् । यथा आतुरः रोगी । भेषजात् औषधात् । उग्रात् रौद्रात् । न बिभेति तथा त्वं मा भैषीः । अथवा यथासौ ततो बिभेति तथा त्वं मा भैषीः ॥३॥ ननु उपदेप्टारो बहवः सन्ति तत्कि भवतां विफलप्रयासेन इति आह-जना इत्यादि । वाचाला: तेरे दुःखको नष्ट करके सुखको करनेवाला है ॥२॥ यद्यपि इस (आत्मानुशासन) में प्रतिपादित किया जानेवाला कुछ सम्यग्दर्शनादिका उपदेश कदाचित् सुननेमें अथवा आचरणके समयमें थोडासा कडुआ (दुःखदायक) प्रतीत हो सकता है, तो भी वह परिणाममें मधुर (हितकारक) ही होगा। इसलिये हे आत्मन् ! जिस प्रकार रोगी तीक्ष्ण (कडुवी) औषधिसे नहीं डरता है उसी प्रकार तू भी उससे डरना नहीं ॥ विशेषार्थ- जिस प्रकार ज्वर आदिसे पीडित बुद्धिमान् मनुष्य उसको नष्ट करनेके लिये चिरायता आदि कडुवी भी औषधिको प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करता है,उसी प्रकार संसारके दुःखसे पीडित भव्य जीवोंको इस उपदेशको सुनकर प्रसन्नतापूर्वक तदनुसार आचरण करना चाहिये । कारण यह कि यद्यपि आचरणके समय वह कुछ कष्टकारक अवश्य दिखेगा तो भी उसका फल मधुर (मोक्षप्राप्ति) होगा ॥३॥ जिनका उत्थान (उत्पत्ति और प्रयत्न) व्यर्थ है ऐसे वाचाल मनुष्य और मेघ दोनों ही सरलतासे प्राप्त होते हैं। किन्तु जो भीतरसे आर्द्र ( दयालु और जलसे पूर्ण ) होकर जगत्का उद्धार करना
SR No.090070
Book TitleAtmanushasanam
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorA N Upadhye, Hiralal Jain, Balchandra Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year2004
Total Pages366
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Spiritual, Sermon, & Religion
File Size28 MB
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