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________________ आराधनासमुच्चयम् ७५ तो उसके समझ में नहीं आयेगा। तब आचार्यदेव ने उसको प्रतीति कराने के लिए विस्तृत व्याख्यान से जो बाह्य विषय में सामान्य जानना है, उसका नाम 'दर्शन' स्थापित किया है और जो यह सफेद है, यह कृष्ण है, इत्यादि रूप से बाहा में विशेष का जानना है, उसका नाम ज्ञान कहा गया है। ज्ञान में समीचीन और असमीचीनपना है, दर्शन में नहीं क्योंकि ज्ञान में यह कृष्ण है, श्वेत है, आदि विकल्प हैं। विकल्प असमीचीन भी हो सकते हैं, अतः ज्ञान में सम्यग, असम्यग्पना है, परन्तु दर्शन में विकल्प नहीं है इसलिए दर्शन में सम्यग्पना - असम्यग्पना नहीं है। सामान्य का दूसरा अर्थ आत्मा भी है अत: सामान्य (आत्माभिमुखी) परिणाम भी दर्शन है। अवधिदर्शन लक्षण अवधिज्ञानात्पूर्वं रूपिपदार्थावभासि यज्ज्योतिः। प्रविनिर्याति स्वस्मान्नाम्नावधिदर्शनं तत्स्यात् ॥४६॥ अन्वयार्थ - अवधिज्ञानात् - अवधिज्ञान से। पूर्व - पूर्व। रूपिपदार्थावभासि - रूपी पदार्थों का अवभास कराने वाली। यत् - जो। ज्योतिः - ज्योति । स्वस्मात् - अपने आप से। प्रविनिर्याति - निकलती है। तत् - वह ज्योति । नाम्नावधिदर्शनं - नाम से अवधिदर्शन। स्यात् - होता है। अर्थ - अवधिज्ञान के पूर्व जो सामान्य अवलोकन होता है, वह अवधिदर्शन है। अवधिदर्शनावरण कर्म का क्षयोपशम होने पर बिना किसी इन्द्रियों के अवलम्बन से मूर्तिक द्रव्य का विकल्प रूप से (एकदेश रूप) सामान्यत: अवबोध करता है, सामान्यत: वस्तु का अवलोकन होता है, वह अवधिदर्शन कहलाता परमाणु से लेकर अन्तिम स्कन्ध पर्यन्त जो पुद्गल द्रव्य स्थित है, उसके प्रत्यक्ष ज्ञान के पूर्व अवधिज्ञान का निमित्तभूत स्वशक्ति विषयक उपयोग होता है, वह अवधिदर्शन कहलाता है। अर्थात् सर्व लघु परमाणु से आदि लेकर सर्व महान् अन्तिम स्कन्ध पर्यन्त जितने मूर्तिक द्रव्य हैं, उनका अवधिज्ञान के पूर्व प्रत्यक्ष सामान्य निराकार अवलोकन करता है, वह अवधि दर्शन है। यह अवधिदर्शन आत्मा से होता है, इन्द्रियों का अवलम्बन नहीं लेता है, अतः स्वस्मात् यह शब्द दिया गया है। केवलदर्शन का लक्षण केवलबोधनविषयप्रकाशि यज्ज्योतिरात्मनो निःसृतम्। तत्केवलदर्शनमिति वदन्ति निःशेषतत्त्वविदः ॥४७॥ अन्वयार्थ - केवलबोधनविषयप्रकाशि - केवलज्ञान के विषय को प्रकाशित करने वाली । यत् - जो। आत्मनः - आत्मा से। ज्योतिः - ज्योति। निःसृतं - निकलती है। तत् • उसको। निःशेषतत्त्वविदः - सम्पूर्ण तत्त्वों को जानने वाले केवली भगवान। केवलदर्शनं - केवलदर्शन । इति - इस प्रकार | बदन्ति - कहते हैं।
SR No.090058
Book TitleAradhanasamucchayam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRavichandramuni, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages376
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size10 MB
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