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________________ आराधनासमुच्चयम् - ४५ हुआ जो उदीरणा द्रव्य है वह असंख्यात समयप्रबद्ध प्रमाण होता है। इसके अन्तर्मुहूर्त काल व्यतीत होने पर दर्शनमोहनीय का अन्तर करता है। प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति की जो विधि कही थी, वही विधि इस में है। परन्तु प्रथमोपशम सम्यक्त्व में जो गुण-संक्रमण आदि पूर्ण काल अन्तर्मुहूर्त कहा था, उससे संख्यात गुणा काल पर्यन्त द्वितीयोपशम सम्यग्दृष्टि प्रथम समय से लगाकर प्रतिसमय अनन्त गुणी विशुद्धि करता है। यहाँ एकांतानुवृद्धता की वृद्धि का काल अन्तर्मुहूर्त मात्र है। इस एकान्तानुवृद्धि काल के पश्चात् परिणामों की हानि-वृद्धि भी होती रहती है, जैसे का तैसा भी रह सकता है। कोई नियम नहीं है। इस प्रकार सम्यक्त्व प्रकृति रूप दर्शन मोहनीय का उपशमन कर द्वितीयोपशम सम्यग्दर्शन प्राप्त करता है। उसके बाद बहुत बार प्रमत्त, अप्रमत्त गुणस्थान में गमनागमन करके उपशम श्रेणी पर आरूढ़ होता है। इस उपशम सम्यग्दर्शन में सर्वप्रथम अनन्तानुबंधी का विसंयोजन होता है, तदनन्तर तीन दर्शन मोहनीय का उपशमन होता है। अनन्तानुबंधी की विसंयोजना धवला, गोम्मटसार जीव प्रबोधिनी, लब्धिसार आदि के रचयिता आचार्य मानते हैं, परन्तु कषायपाहुड़ में उच्चारणाचार्य ने इसका निषेध किया है। सम्यग्दर्शन के शुद्ध वा मिश्र भेद शुद्धं वा मिनं वा विरतिभ्यां कर्मभूमिजः शुद्धम्। शेषः क्षायिकदर्शनवत्तावत् कलुषताभावात् ॥१५॥ अन्वयार्थ - यह उपशम सम्यग्दर्शन । विरतिभ्यां - व्रत और अव्रत या दो प्रकार की विरति (देशविरति, सकलविरति) के संयोग से ! शुद्ध - शुद्ध (दोनों प्रकार के व्रतों के साथ वाला सम्यग्दर्शन शुद्ध)। वा - अथवा। मिश्रं - जो अव्रत सहित है मिश्र है। कर्मभूमिजः - कर्मभूमिज मनुष्यों के यह शुद्ध हो सकता है। शेषः - शेष गतियों में अशुद्ध होता है। तावत् - उसमें। कलुषताभावात् - कालुष्य भाव का अभाव होने से। क्षायिकदर्शनवत् - क्षायिक सम्यग्दर्शन के समान निर्मल होता है। भावार्थ - यह सम्यग्दर्शन शुद्ध और मिश्र के भेद से दो प्रकार का है। जो सम्यग्दर्शन एकदेश वा सकलदेश व्रतों के साथ है, व्रती पुरुष के है, वह शुद्ध कहलाता है। सम्यग्दर्शन स्वयं तो निर्मल है, शुद्ध है, क्षायिक सम्यग्दर्शन के समान निर्मल है, परन्तु अव्रत सहित है अत: अशुद्ध है। इसमें सम्यग्दर्शन है परन्तु अव्रती है इसलिए मिश्र है। कर्मभूमिज मनुष्य एवं तिर्यञ्च ही व्रती बन सकते हैं। इसलिए इनका सम्यग्दर्शन शुद्ध हो सकता है। शेष गतियों में व्रती बन नहीं सकता, अत: वहाँ मिश्र है।
SR No.090058
Book TitleAradhanasamucchayam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRavichandramuni, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages376
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size10 MB
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