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________________ 卐 आमुख ॥ ग्रन्थकर्ता: जैन धर्म के इतिहास में बहुत से आचार्यों के लिखे ग्रन्थ तो प्राप्त होते हैं परन्तु उनके रचयिता का नामोल्लेख दुष्प्राप्य है । किन्हीं का नाम प्राप्त है तो उसमें भी विद्वानों का विवाद है क्योंकि एक नाम के कितने ही आचार्य हुए हैं, जैसे भद्रबाहु श्रुतकेवली भी हुए हैं और अन्य आचार्य भी हुए हैं। अत: 'भद्रबाहु संहिता' में विवाद है। इसी प्रकार आराधना समुच्चय के विषय में विवाद है क्योंकि रविचन्द्र नामक तीन आचार्य हुए हैं। आचार्य रविचन्द्र अपने को मुनीन्द्र कहते हैं। उनका निवासस्थान कर्नाटक प्रान्त के अन्तर्गत 'पनसोग' नामका ग्राम है। कर्नाटक के शिलालेखों में रविचन्द्र का नाम कई स्थानों पर आया है। अभिलेखों से इनका समय ई. सन् की दशम शताब्दी सिद्ध होता है। धारवाड़ के सन् १९६२ ई. के एक अभिलेख में रविचन्द्र मुनि का उल्लेख आया है। (दक्षिण भारतीय एपिग्राफिका के वार्षिक प्रतिवेदन सन् १९३४-३५ पृ. ७ अभिलेख संख्या ५३२ में इसका उल्लेख है। एक अन्य रविचन्द्र का उल्लेख मासोपवासी सैद्धांतिक के रूप से प्राप्त होता है। इस अभिलेख में माघनन्दी की गुरु परम्परा दी गई है। बताया है कि नन्दिसंघ बलात्कारगण के वर्तमान मुनि होयसल राजा के गुरु थे। उन्होंने माघनन्दी की परम्परा इस प्रकार लिखी है- श्रीधर, विद्य पद्मनन्दी, त्रैविधवासुपूज्य, सैद्धान्तिक शुभचन्द्र भट्टारक, अभयनन्दी भट्टारक-अरुहणंदि सैद्धान्तिक, देवचन्द्र अष्टोपवासी, कनकचन्द्र, नयकीर्ति, मासोपवासी रविचन्द्र, हरिनंदी, श्रुतकीर्ति, त्रैविद्य वीरनंदी, हरियनन्दी, श्रुतकीर्ति विद्य, वीरनन्दि सैद्धान्तिक, गण्डविमुक्त, नेमिचन्द्र भट्टारक, गुणचन्द्र, जिनचन्द्र, वर्द्धमान, श्रीधर, वासुपूज्य, विद्यानन्दी स्वामी, कटकोपाध्याय, श्रुतकीर्ति, वादिविश्वासघातक, मलेयालपाण्डय देव, नेमिचन्द्र-मध्याह्न कल्पवृक्ष, वासुपूज्य इत्यादि माघनन्दी आचार्य की परम्परा जैन शिलालेख संग्रह भाग चार में स्पष्ट रूप से लिखी है। एक रविचन्द्र का उल्लेख 'प्रवणबेलगोला के अभिलेख सं. ५३ में आया है। इस अभिलेख के अनुसार रविचन्द्र सन् ११३० में वर्तमान थे। माघनंदी आचार्य की परम्परा में होने वाले रविचन्द्र का समय ई. सन् की १३ वीं शताब्दी सिद्ध होती है। ___ 'आराधना समुच्चय' के रचयिता रविचन्द्र उपर्युक्त रविचन्द्र ही हैं या इनसे भिन्न हैं, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। ग्रन्थ के अन्त में ग्रन्थकार ने स्वयं अपना परिचय एक पद्य में इस प्रकार दिया है। श्रीरविचन्द्रमुनीन्द्रः पनसोगेग्रामवासिभिर्ग्रन्थः । रचितोऽयमखिलशास्त्रप्रवीण-विद्वन्मनोहारी ॥४२॥ इस श्लोक से यह तो स्पष्ट हो जाता है कि रविचन्द्र आचार्य दक्षिण भारत के रहने वाले थे और जैन शास्त्रों के अद्भुत ज्ञाता थे। माघनन्दी की परम्परा में हलेवीड़ के एक संस्कृत और कन्नड़मिश्रित अभिलेख में अभयनन्दी का नामोल्लेख है। "स्वस्ति श्री मूलसंघ देशीयगण, पुस्तक गच्छ कोण्डकुन्दान्वय दिङ्गलेश्वर दबलिय श्रीसमुदायदमाघनंदिभट्टारकदेवर प्रिय शिष्य सं. श्रीमन्नेमिचन्द्र भट्टारक देवसं श्रीमदभयचन्द्र सिद्धान्त चक्रवर्ती गलुं शकवर्ष १११७ ने मय भाव संवत्सरद भाद्रपद शुद्ध १२ बुधवारद।" ___ हलेबीड़ के एक अन्य अभिलेख में जो शक संवत् १२०१ (ई. सन् १२७९) का है इसमें अभयचन्द्र के समाधिमरण का उल्लेख है।
SR No.090058
Book TitleAradhanasamucchayam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRavichandramuni, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages376
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size10 MB
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