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________________ आराधनासमुच्चयम् १०९ क्षयोपशमजानि - क्षयोपशम से उत्पन्न होते हैं। अशेषवस्तुस्वरूपसंवेदि - सर्ववस्तुओं के स्वरूप का ज्ञाता। क्षयजं - सम्पूर्ण आवरण के क्षय से उत्पन्न होने वाला। तत् - वह। केवलं - केवलज्ञान है। अर्थ - मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान अपने आवरण के क्षयोपशम से होते हैं इसलिए क्षायोपशमिक हैं और समस्त वस्तुओं के स्वरूप को जानने वाला सम्पूर्ण ज्ञानावरणीय के क्षय से उत्पन्न होने वाला केवलज्ञान है। मतिज्ञान और श्रुतज्ञान सर्व द्रव्य और उनकी कुछ पर्यायों को जानते हैं । इस ज्ञान की उत्पत्ति या विकास में इन्द्रिय और मन कारण होता है। अवधिज्ञान केवल रूपी पदार्थों को जानता है और उनकी भी सारी पर्यायों को नहीं जानता है। कर्मबन्ध से युक्त आत्मा और आत्मा के कुछ भवों को जानता है। अवधिज्ञान में इन्द्रिय और मन कारण नहीं पड़ते हैं, अपितु सीधे आत्मा से ही जानता है। मन:पर्ययज्ञान दूसरे के मन में स्थित पदार्थों को जानता है। ये चारों ज्ञान सीमित हैं, परन्तु केवलज्ञान असीम है, क्षायिक है एवं स्वाभाविक है। संक्षेप से प्रमाण का कथन और नय का स्वरूप सामान्यविशेषात्मकवस्तुग्रहणात्प्रमाणमेतद्धि। नय एकांशग्रहणाद् दुर्नय इतरांशनिर्लोपात् ॥८५।। अन्वयार्थ -- हि - निश्चय से। सामान्यविशेषात्मकवस्तु ग्रहणात् - सामान्यविशेषात्मक वस्तु को ग्रहण करने वाला। एतत् - यह। प्रमाणं - प्रमाण है। एकांशग्रहणात् - एक अंश ग्रहण करने वाला होने से । नयः - नय कहलाता है। इतरांशनिर्लोपात् - इतर अंश का लोप करने वाला। दुर्नय: - दुर्नय कहलाता है। अर्थ - सामान्य-विशेषात्मक वस्तु को ग्रहण करने वाला प्रमाण कहलाता है तथा वस्तु के एकदेश को ग्रहण करने वाला नय कहलाता है। जो एक अंश का लोप करता है, वह दुर्नय कहलाता है। विशेषार्थ - अर्थीजन जिसके लिए बाह्य और आभ्यन्तर तप के द्वारा मार्ग का केवन अर्थात् सेवन करते हैं वह केवलज्ञान कहलाता है। अथवा केवल शब्द असहायवाची है। जो ज्ञान असहाय है अर्थात् इन्द्रिय, मन और आलोक की अपेक्षा से रहित है। त्रिकालगोचर अनन्त पर्यायों से समवाय सम्बन्ध को प्राप्त अनन्त वस्तुओं को जानने वाला है, असंकुचित अर्थात् सर्व व्यापक है और असपत्न अर्थात् प्रतिपक्षी रहित है, उसे केवलज्ञान कहते हैं। आत्मा ज्ञानप्रमाण है, ज्ञान ज्ञेयप्रमाण है तथा ज्ञेय लोक और अलोक है, इसलिए ज्ञान सर्वगत है। ज्ञान चित्रपट के समान है। जैसे चित्रपट में अतीत, अनागत और वर्तमान वस्तुओं के आलेख्याकार साक्षात् एक समय में भासित होते हैं, उसी प्रकार ज्ञानरूपी भित्ति में भी भासित होते हैं।
SR No.090058
Book TitleAradhanasamucchayam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRavichandramuni, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages376
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size10 MB
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