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________________ आराधनासमुच्चयम्-१०७ है। यहाँ पर्यायज्ञान सर्वजघन्य है और पूर्वज्ञान उत्कृष्ट है तथा पर्यायसमासादि पूर्व तक मध्यम भेद असंख्यात लोकप्रमाण हैं। उसी प्रकार विपुलमति मनः पर्ययज्ञान के भी मध्यम भेद असंख्यात लोकप्रमाण विशेषार्थ - मनःपर्यय ज्ञान - अन्य व्यक्तियों के मन की बात को जानना मन:पर्यय ज्ञान है। यह ज्ञान मन के प्रवर्तक या उत्तेजक पुद्गल द्रव्यों को साक्षात् जानने वाला है। चिन्तक जैसा सोचता है उसके अनुरूप पुद्गल द्रव्यों की आकृतियाँ पर्यायें बन जाती हैं। दूसरे के मन में स्थित ये पर्याय मन:पर्ययज्ञान के द्वारा जानी जाती हैं। वस्तुतः मनःपर्ययज्ञान का अर्थ है : मन की पर्यायों का ज्ञान। “परकीयमनसि व्यवस्थितोऽर्थो मनः तत् पर्येति जानाति इति मनःपर्ययः।” इस निरुक्ति अर्थ के अनुसार दूसरे के मन में स्थित पदार्थों को मनः कहते हैं और उस मन में स्थित पदार्थों को जानने वाला ज्ञान मन:पर्ययज्ञान है। सारांश यह है कि संज्ञी-समनस्क जीयों के मन पं जितने विकल्प उल्लन होते हैं वे संस्कार रूप से उनमें अवस्थित रहते हैं। मन:पर्ययज्ञान संस्कार रूप से अवस्थित मन के इन्हीं विकल्पों को जानता है। मनःपर्ययज्ञानी प्रथम मतिज्ञान के द्वारा दूसरे के मानस को ग्रहण करता है और तदनन्तर मन:पर्ययज्ञान की प्रवृत्ति अपने विषय में होती है। गोम्मटसार में लिखा है- ऋजुमति और विपुलमति के भेद से मनःपर्यय ज्ञान दो प्रकार का है। ऋजुमति वाला दूसरे के मन में सरलता के साथ स्थित पदार्थ को पहले ईहा मतिज्ञान के द्वारा जानता है, तदनन्तर प्रत्यक्षरूप से नियम से ऋजुमति ज्ञान के द्वारा जानता है। अंगोपांग नामकर्म के उदय से मनोवर्गणा के स्कन्धों द्वारा हृदयस्थान में नियम से विकसित आठ पाँखड़ी के कमल के आकार में द्रव्य मन उत्पन्न होता है, इस द्रव्य मन की नोइन्द्रिय संज्ञा भी है क्योंकि दूसरी इन्द्रियों की तरह यह व्यक्त नहीं है। इस द्रव्य मन के होने पर ही भाव मन तथा मनःपर्ययज्ञान उत्पन्न होता है। सामान्य की अपेक्षा मनःपर्यय एक प्रकार का है और विशेष भेदों की अपेक्षा दो प्रकार का है: ऋजुमति और विपुलमति। ऋजुमति के तीन भेद भी हैं - ऋजुमनोगतार्थ विषयक, ऋजुवचनगतार्थ विषयक और ऋजुकायगतार्थ विषयक । परकीय मनोगत होने पर भी जो ज्ञान सरलतया मन, वचन, काय के द्वारा ग्रहण किये हुए पदार्थों को विषय करता है वह ऋजुमति मनःपर्यय ज्ञान है। विपुलमति मनःपर्ययज्ञान के छह भेद हैं। ऋजु (सरल) मन, वचन, काय के द्वारा चिन्तित परकीय मनोगत पदार्थों का विषय करने की अपेक्षा तीन भेद हैं तथा कुटिल मन, वचन, काय के द्वारा परकीय मनोगत पदार्थों को विषय करने की अपेक्षा तीन भेद हैं।
SR No.090058
Book TitleAradhanasamucchayam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRavichandramuni, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages376
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size10 MB
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