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________________ आराधनासमुच्चयम् ९६ कल्प्यव्यवहार, कल्प्याकल्प्य, महाकल्प्य, पुण्डरीक, महापुण्डरीक, निषिद्धिका ये १४ (चौदह) प्रकीर्णक अंगबाह्य कहलाते हैं। 'सम्' उपसर्ग का अर्थ एकरूप है अतः एकत्व रूप से आत्मा में गमन (प्रवृत्ति) करना तथा परद्रव्य से निवृत्ति होने रूप उपयोग की प्रवृत्ति है उसको शास्त्र में समय - आत्मा कहा गया है। 'सं' अर्थात् एकत्वपने से 'आय' अर्थात् आगमन | परद्रव्यों से निवृत्त होकर उपयोग की आत्मा में प्रवृत्ति होना। "मैं ज्ञाताद्रष्टा हूँ" इस प्रकार का आत्मगोचर ध्यान सामायिक है। जिसमें नाम, स्थापना, द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव के द्वारा चतुर्विंशति तीर्थंकरों के पंच कल्याणक, चौंतीस अतिशय, आठ प्रातिहार्य, परम औदारिक शरीर, समवसरण की विभूति और धर्मोपदेश का वर्णन किया जाता) है वह वा उससे प्रतिबद्ध स्तवन प्रकीर्णक है। जिनेन्द्रों में से एक जिनेन्द्र सम्बन्धी तथा एक जिनेन्द्र के चैत्य वा चैत्यालय की स्तुति करना, जिनेन्द्रदेवकथित वंदना है। द्रव्यादि के भेद से वंदना बहुत प्रकार की है। रत्नत्रय के धारक यति, आचार्य, उपाध्याय, प्रवर्तक, वृद्धसाधु के उत्कृष्ट गुणों की श्रद्धा सहित विनय करना वा एक जिनदेव, उनके बिम्ब आदि का स्तवन करना वंदना है। अथवा ऋषभादि चतुर्विंशति तीर्थंकर, भरतादि केवली, आचार्य एवं चैत्यालयादिकों के गुणगुणभेद के आश्रित शब्दकलापों से युक्त गुणों का अनुस्मरण करके नमस्कार करने को वंदना कहते हैं। जिसमें सात प्रकार के प्रतिक्रमणों का वर्णन होता है, वह प्रतिक्रमण प्रकीर्णक है। जिस प्रकीर्णक (शास्त्र) में ज्ञान विनय, दर्शन विनय, चारित्र विनय, तप विनय और उपचार विनय के भेद से पाँच प्रकार के विनय का कथन किया जाता है, वह वैनयिक प्रकीर्णक है। पंच परमेष्ठी (अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, सर्वसाधु), जिनवचन (शास्त्र), जिनधर्म, जिनालय और जिनप्रतिमा इन नव देवताओं की वंदना निमित्त आत्माधीनता, तीन प्रदक्षिणा, तीन बार नति, चार शिरोनति, बारह आवर्तन आदि नित्यनैमित्तिक क्रियाओं की विधि का बत्तीस दोष टालकर कृतिकर्म (वंदना) करने का प्ररूपण करने वाला कृतिकर्म प्रकीर्णक कहलाता है। जो मुनिजनों की गोचरी विधि और पिण्ड शुद्धि का प्ररूपण करता है अथवा जिसमें दशवैकालिक सूत्र का वर्णन किया गया है, वह दशवकालिक प्रकीर्णक है। विशिष्ट काल को विकाल कहते हैं और विकाल में होने वाली क्रियाओं को वैकालिक कहते हैं और जिसमें दशवेकालिकों का वर्णन किया जाता है, वह दशवकालिक है। यह मुनिजनों की आचरण विधि, गोचरी विधि और पिण्डशुद्धि का कथन करता है। चार प्रकार (तिर्यञ्च, मानव, देव और अचेतनकृत) के उपसर्गों को कैसे सहन करना चाहिए,
SR No.090058
Book TitleAradhanasamucchayam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRavichandramuni, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages376
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size10 MB
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