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________________ आराधनासमुच्चयम् १ ९५ अंकविन्यासादि चार, बीज, मोक्ष के स्वरूप का, मोक्षगमन में कारणभूत शुभ धार्मिक क्रियाओं और लोक के अवयव और लोक के सार का वर्णन किया जाता है, वह चौदहवाँ लोकबिन्दुसार नामक पूर्व है। अथवा लोक का अर्थ जनसमुदाय, मज्जा, जल आदि अनेक अर्थ होते हैं। उनमें होने वाली सारभूत वस्तु का कथन इसमें पाया जाता है। इसमें दस वस्तु सम्बन्धी दो सौ प्राभृत और एक करोड़ पाँच लाख पद हैं। दृष्टिवाद का पाँचवाँ भेद है चूलिका | जलगता, स्थलगता, मायागता, रूपगता और आकाशगता के भेद से चूलिका पाँच प्रकार की है। जिसमें जलस्तंभन, जलगमन, अग्निस्तंभन, अग्निभक्षण, अग्निआसन (अग्नि पर बैठना), अग्निप्रवेश आदि के कारणभूत मंत्र, तंत्र, तपश्चरण आदि का वर्णन है, वह जलगता चूलिका है। जलगता चूलिका के दो करोड़, नौ लाख, नवासी हजार, दो सौ पद हैं। मेरु कुलाचल भूमि आदि में प्रवेश, शीघ्रगमनादिक का जो वर्णन करती है वह स्थलगता है, वास्तु वा भूमि सम्बन्धी दूसरे शुभ-अशुभ कारणों का भी वर्णन करती है। स्थलगता चूलिका के दो करोड़, नौ लाख, नवासी हजार, दो सौ पद हैं। जिस चूलिका में भूमि में प्रवेश करने का वा शीघ्रगमन करने का, भूमि में जल के समान डुबकी लगाने आदि के कारणभूत मंत्र, तंत्र तपश्चरण आदि का मनोज्ञ निरूपण है, वह स्थलगता चूलिका है। जो माया रूप इन्द्रजाल तथा विक्रिया के कारणभूत मंत्र-तंत्र तपश्चरणादिक के कौतूहल का कथन करती है, वह मायागत चूलिका है। सिंह, हाथी, घोड़ा, हिरण, मानव, वृक्ष, श्याल, खरगोश, बैल, व्याघ्र आदि रूप परावर्तन के कारणभूत मंत्र, तंत्र, तपश्चरण आदि का जो वर्णन करती है तथा मानवभव के सुख के कारणभूत क्रिया तथा चित्र, काष्ठ, लेप्य, उत्खनन आदि लक्षण धातुवाद, रसवाद आदि का वर्णन करती है, उसे रूपगता चूलिका कहते हैं। आकाश में गमन आदि के कारणभूत मंत्र, तंत्र, तपश्चरण आदि का जो वर्णन करती है, वह आकाशगता चूलिका है। इसके भी दो करोड़, नौ लाख, नवासी हजार दो सौ पद हैं। ऋत अर्थ के ज्ञाता गणधर देव के शिष्य-प्रशिष्यों के द्वारा कालदोष से अल्प आयु बुद्धिबल वाले प्राणियों के अनुग्रह के लिए अंगों के आधार से रचे गये संक्षिप्त ग्रन्थ अंगबाह्य हैं। कालिक और उत्कालिक के भेद से अंगबाह्य अनेक प्रकार के हैं। स्वाध्याय काल में पढ़ने योग्य को कालिक कहते हैं। जिनके पढ़ने का समय निश्चित नहीं है, किसी भी समय में पढ़ सकते हैं, उनको उत्कालिक कहते हैं। सामायिक, चतुर्विंशति स्तवन, वंदना, प्रतिक्रमण, वैनयिक, कृतिकर्म, दशवैकालिक, उत्तराध्ययन,
SR No.090058
Book TitleAradhanasamucchayam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRavichandramuni, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages376
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size10 MB
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