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________________ आराधनासार-५५ जीव: भ्रमति भ्रमिष्यति भ्रांतः पूर्वं तु नरकनरतिर्यक् । अलभमानो ज्ञानमयीमात्माराधनां ज्ञातुम् ।।१४।। भमइ भ्रमति। कोसौँ। जीवो जीवः वर्तमानकालापेक्षया चतुर्गतिसंसारं पर्यटति तथा भविष्यत्कालापेक्षया भमिस्सइ भ्रमिष्यति पर्यटिष्यति । न- कथं भ्रमति भ्रमिष्यतीति संभान्यते । तदेवाह । पुव्वं तु पूर्वं तु भमिओ भ्रांतः। यदि पूर्वं भ्रांतो नाभविष्यत् तदा वर्तमान भाव्यं च भ्रमणं नारिष्यत् पूर्व भ्रांतश्चायं तस्मात् वर्तमाने भाविनि काले च भ्रमणं सिद्धमेवास्य। अलमिति विस्तरेण । यदुक्तं कालास्त्रयोप्यतीताद्या तानपेक्ष्य मिथोप्यमी। प्रवर्तेरन् यतो नैकः केवलं क्वापि दृश्यते॥ क्वणरयणरतिरिय नरकनरतिर्यगतौ अर्थत्वादनुक्तोऽपि गतिशब्टो लभ्यते सुखावबोधार्थं । यद्वा शब्दस्य लाक्षणिकत्वादपि, यथा गंगायां धोष इत्युक्ते तटो लभ्यते । तथा नरक इत्युक्ते नरकगतिः नर इत्युक्ते नरगति: एवं सर्वत्र उपलक्षणाद्देवगतौ च । किंकुर्वाण;। अलहंतो अलभमान: अप्राप्नुवन् । कां। आत्माराधनां शुद्धात्मध्यानं । किं कर्तुं। णाउं ज्ञातु मंतुं अनुभवितुमित्यर्थः । कथंभूतामात्माराधनां। णाणभई ज्ञानमयीं यह जीव वर्तमान काल की अपेक्षा चारों गतियों में भ्रमण कर रहा है और भविष्य में भी भ्रमण करेगा। शंका - भ्रमण कर रहा है और भविष्य में भी भ्रमण करेगा, इसकी संभावना कैसे हो सकती है? उत्तर - पूर्व में भ्रमण किया था क्योंकि जिसने पूर्व में भ्रमण नहीं किया, वह वर्तमान में भ्रमण नहीं कर सकता ? पूर्व में भ्रमण किया है, इसलिये वर्तमान और भविष्य काल का भ्रमण इस जीवके सिद्ध होता है। क्योंकि जीव का सत्त्व अनादि काल से है और अनन्त काल तक रहेगा। न तो असत् का उत्पाद होता है और न सत् का विनाश होता है, अधिक कहने से क्या प्रयोजन है। सो ही कहा है “अतीत (भूत) आदि तीन काल हैं। उन तीनों कालों की परस्पर अपेक्षा रख कर ही प्रवृत्ति होती है। अर्थात् तीनों काल परस्पर सापेक्ष हैं। भविष्यत्काल ही वर्तमान बनता है और वर्तमान ही भूत बनता है। क्योंकि एक काल कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होता। नरक, नर, तिर्यञ्च शब्द में गति शब्द का उच्चारण न होने पर भी उपलक्षण से सरलता से समझने हेतु गति का ग्रहण हो जाता है। अथवा, शब्द के लाक्षणिकत्व है, उसका अर्थ प्रकरणवश होता है। जैसे नदी में घोष (ग्राम) है', ऐसा कहने पर 'नदी के तट पर ग्राम' ऐसा अर्थ होता है। उसी प्रकार 'नरक' ऐसा कहने पर 'नरक गति' का ज्ञान होता है। उसी प्रकार नर से नर गति, तिर्यंच से तिर्यंञ्च गति का ग्रहण होता है। तथा देवगति का गाथा में उल्लेख नहीं होने पर भी उपलक्षण' से देवगति का ग्रहण होता है। १. सदृशाही को उपलक्षण कहते हैं।
SR No.090057
Book TitleAradhanasar
Original Sutra AuthorDevsen Acharya
AuthorRatnakirtidev, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages255
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size6 MB
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