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________________ आराधनासार-४४ चारित्राराधनां व्याख्याय तप आराधनां प्रतिपादयति बारहविहतवयरणे कीरइ जो उज्जमो ससत्तीए। सा भणिया जिणसुत्ते तवम्मि आराहणा णूणं ॥७॥ द्वादशविधतपश्चरणे क्रियते य उद्यमः स्वशक्त्या । सा भणिता जिनसूत्रे तपसि आराधना नूनम् ।।७।। इस प्रकार चारित्र आराधना का व्याख्यान करके अब तप आराधना का प्रतिपादन करते हैं बारह प्रकार के तपश्चरण में जो अपनी शक्ति के अनुसार उद्यम करता है, निश्चय से उसे जिनसूत्र में तप आराधना कहा है।।७।। आभ्यन्तर और बाह्य के भद सं तप दो प्रकार का है। बाह्य तप के छह भेद हैंअनशन - स्वाद्य, खाद्य, लेह्य और पेय रूप चार प्रकार के आहार का त्याग करना अनशन है। अवमौदर्य - भूख से कम खाना अवमौदर्य है। व्रतपरिसंख्यान - आहार को जाते समय कुछ-न-कुछ नियम लेना। रस परित्याग - इन्द्रियों को वश में करने के लिए घी, तेल, नमक, दूध, दही और मीठा (चीनी, गुड आदि) इन छहों रसों का त्याग करना। विविक्त शय्यासन - मन को स्थिर करने के लिए, ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने के लिए और स्वाध्याय की सिद्धि के लिए एकान्त में बैठना-सोना। __ कायक्लेश - उपसर्ग और परिषहों को सहन करने की शक्ति प्राप्त करने के लिए सर्दी, गर्मी, भूखप्यास आदि सहन करना। ये छह प्रकार के बाह्य तप मिथ्यादृष्टि भी तपते हैं और ब्राह्य में दृष्टिगोचर भी होते हैं अत: ये बाह्य कहलाते हैं। दशलक्षण, सोलहकारण आदि जितने भी व्रतों का कथन किया है वे सब बाह्य तप हैं। प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान ये छह अंतरंग तप हैं। प्रायश्चित - प्रमाद और अज्ञान के कारण व्रतों में लगे हुए दोषों का प्रमार्जन करने के लिए विनय पूर्वक प्रायश्चित्त लेना (दण्ड लेना)। विनय - दर्शन, ज्ञान, चारित्र और उपचार के भेद से विनय चार प्रकार का है वा तप के भेद से पाँच प्रकार का भी है। सम्यग्दर्शन का विनय करना, अर्थात् जीवादि पदार्थों के अस्तित्व में और आत्मतत्त्व में रुचि रखना दर्शन विनय है। वा व्यवहार में सम्यग्दर्शन की पूजा करना. उसके पच्चीस दोषों का निराकरण भी दर्शन विनय है। सम्यग्ज्ञान के साधनभूत जिनेन्द्रकथित शास्त्रो का विनय करना, उनकी पूजा करना और शास्त्रज्ञों का सत्कार करना ज्ञान विनय है। तेरह प्रकार के चारित्र का विनय करना, चारित्र धारण करने का उत्साह रखना "वह समय कब आयेगा जिस दिन मैं दिगम्बर मुद्रा धारण कर आत्मकल्याण करूँगा" ऐसी भावना रखना चारित्र विनय है। १२ प्रकार के तपश्चरण करने का अनुराग रखना, तपश्चरण करने में उत्साह रखना तप विनय है। सम्यक्चारित्रधारी मुनिराज के आने पर उठकर खड़े होना, चलने पर उनके पीछे-पीछे चलना, परोक्ष में उनको नमस्कार करना, उनकी आज्ञा का पालन करना ये सब उपचार विनय हैं।
SR No.090057
Book TitleAradhanasar
Original Sutra AuthorDevsen Acharya
AuthorRatnakirtidev, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages255
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size6 MB
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