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________________ आराधनासार - ३४ आभ्यंतरं दर्शनमोहस्योपशमः क्षयः क्षयोपशमो वा । बाह्यं नारकाणां प्राक् चतुर्थ्याः सम्यग्दर्शनस्य साधनं केषांचिज्जातिस्मरणं केषांचिद्धर्मश्रवणं केषांचिद्वेदनाभिभवः, चतुर्थीमारभ्य आसप्तम्यां नारकाणां जातिस्मरणं वेदनाभिभवश्च । तिरश्चां केषांचिज्जातिस्मरणं केषांचिद्धर्मश्रवणं केषांचिज्जिन बिनदर्शनं । मनुष्याणामपि तथैव । देवानामपि केषांचिज्जातिस्मरणं केषांचिद्धर्मश्रवणं केषांचिज्जिनमहिमदर्शनं केषांचिद्देवर्धिदर्शनं । एवं प्रागानतात् । अनतप्राणतारणाच्युतदेवानां देवर्धिदर्शनं मुक्त्वा अन्यत्रितयमप्यस्ति । नवग्रैवेयकवासिनां केषांचिज्जातिस्मरणं केषांचिद्धर्मश्रवणं । अनुदिशानुत्तरविमानवासिनामियं कल्पना न भवति प्रागेव गृहीतसम्यक्त्वानां तत्रोत्पत्तेः । सम्यग्दर्शन के साधन का कथन करते हैं। सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति के कारणों को साधन कहते हैं। वह साधर दो प्रकार का है : अंतरंग और बा सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का अंतरंग कारण दर्शन मोहनीय की तीन और चारित्र मोहनीय की चार प्रकृतियों का उपशम, क्षय और क्षयोपशम है। यह चारों गतियों में सामान्य है। बाह्य कारण अनेक प्रकार के हैं और कथंचित् भिन्न-भिन्न हैं? जातिस्मरण, धर्मश्रवण, बेदनानुभव, जिनबिम्बदर्शन, जिनमहिमादर्शन और देव ऋद्धिदर्शन । गति मार्गणा की अपेक्षा नरक गति में प्रथम नरक से लेकर तीसरे नरक पर्यन्त किसी नारकी को जातिस्मरण से किसी को धर्मश्रवण से और किसी को वेदना के अनुभव से सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है। - चौथे नरक से सातवें नरक पर्यन्त किसी को जातिस्मरण से और किसी को वेदना अनुभव से सम्यग्दर्शन होता है। तिर्यच गति में तिर्यंचों में किसी को जातिस्मरण से, किसी को धर्मश्रवण से और किसी को जिनबिम्ब के दर्शन से सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती है । मनुष्य गति में मनुष्यों के भी तिर्यंचों के समान सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति के तीन कारण हैं। वेदनानुभव, धर्मश्रवण और जातिस्मरण | देवगति में देवों के १२ वें स्वर्ग तक चार कारण हैं- जातिस्मरण, धर्मश्रवण, जिनमहिमादर्शन और देव - ऋद्धि-दर्शन | आनत, प्राणत, आरण और अच्युत स्वर्ग में देव ऋद्धि को छोड़कर अन्य तीन कारण हैं। नव ग्रैवेयकवासी देवों में किसी को जातिस्मरण से और किसी को धर्मश्रवण से सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता | नव ग्रैवेयक में सब देव समान हैं, इसलिए देवऋद्धि दर्शन कारण नहीं है। नव अनुदिश और पाँच अनुत्तर में सम्यग्दृष्टि जीव ही उत्पन्न होते हैं अत: इनमें सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति के कारणों की कल्पना नहीं है। १. जिनेन्द्र भगवान के पंच कल्याणक को जिनमहिमा कहते हैं। २. देवों की सम्पदा, शक्ति आदि को देवऋद्धि कहते हैं।
SR No.090057
Book TitleAradhanasar
Original Sutra AuthorDevsen Acharya
AuthorRatnakirtidev, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages255
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size6 MB
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