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________________ आराधनासार - १५८ भो क्षपक उव्वासहि णिचित्तं यदि निजचिनं स्वकीयांतरंग उद्बासयसि पंचेंद्रियविषयेषु विमुखतां नयसि उद्सति कश्चित्तमुद्वसं अन्यः प्रयुक्त धातोश्च हेताविनीति इन्नंतो वस् धातुरिहावातिव्यं । तथा भो क्षपक सद्भावे शोभने भावे विशुद्धज्ञानदर्शनोपयोगमये परमात्मनि वससि स्थितिं करोषि यदि । क्रिविशिष्टे सद्भावे। सुनिर्मले शुद्धनिश्चयनयापेक्षया रागद्वेषमोहः मदादिदोषोज्झिते। किं कर्तुं सद्भाचे वसति। गंतु तमेव परमात्मानं सम्यक् परिछेत्तुं। सर्वे गत्यर्था धातवो ज्ञानार्था इति। यद्येवं करोषि तो पिच्छसि-अप्पा तदा आत्मान चिदात्मक स्वस्वरूपं पश्यसि अवलोकयसि स्वसंवेदनेन स्वात्मानं संवेदयसीत्यर्थः। कथंभूतमात्माने । सण्णाणं सज्झानं सत् शोभमानं सशयांवमोहविभ्रमवर्जित ज्ञानं यस्य स त सज्ज्ञानं । पुन: किंविशिष्टमात्मानं | केवलमसहायं। पुनः कीदृशं । शुद्ध सर्वोपाधिरहित । यदिचेत् निजचित्तमुवासयसि सद्भावे च वससि तदा स्वात्मानं पश्यसीति समुच्चयार्थः । तथाहि । भो क्षपक! यदि वं संसारशरीरभोगादिषु पराङ्मुखत्वं गतोसि तर्हि परमब्रह्मोपासनवासनानिष्ठो भव ।। यदुक्तम् यदि विषयपिशाची निर्गता देहगेहात् सपदि यदि विशीर्णो मोहनिद्रातिरेकः। यदि युवतिकरके निर्ममत्वं प्रपन्नो झगिति तनु विधेहि ब्रह्मवीथीविहारम् ।। हे क्षपक ! तू स्वकीय मन को पंचेन्द्रिय-विषयों से विमुख करके स्वकीय शुद्धात्मा को जानने के लिए स्वकीय मन को शुद्ध निश्चय नय की अपेक्षा राग-द्वेष, मोह-मद आदि दोषों से रहित निर्मल, विशुद्ध ज्ञान, दर्शन उपयोगमय परमात्मा में स्थिर कर । स्वस्वभाव में अपने मन को लीन कर। इस गाथा में गर्नु शब्द ज्ञान अर्थ में है क्योंकि जितने भी गमनार्थ धातु हैं वे ज्ञान अर्थ में भी हैं। अत: है आत्मन् । यदि तू अपने मन को परमात्मा को जानने के लिए परमात्मा में स्थिर करेगा तो निश्चय से संशय, विमोह, विभ्रम से रहित केवलज्ञानमय, शुद्ध ज्ञान स्वरूप आत्मा का अवलोकन करेगा। स्वसंवेदन ज्ञान के द्वारा शुद्ध सर्व उपाधि रहित अपनी आत्मा का वेदन-अनुभव करेगा। अर्थात् यदि तू अपने मन को विषय-वासनाओं से विमुख करके अपने आप में स्थिर करेगा तो अपने ज्ञान में अपने आपका अवलोकन करेगा। अपने आप का अनुभव करेगा। हे क्षपक ! यदि तू व्यवहार में इस समय संसार शरीर, और भोगों से पराङ्मुख हुआ है, सारे बाह्य पदार्थों का त्याग कर संन्यास धारण किया है तो उसका सार प्राप्त करने के लिए अपने मनको परम ब्रह्म परमात्मा के ध्यान में, चिन्तन में स्थिर कर । परम ब्रह्म परमात्मा की भावना में लीन हो। सो ही कहा है- “हे आत्मन् (क्षपक !) शरीर रूपी घर से विषय-पिशाचिनी निकल गई है, यदि इस समय मोह रूपी निद्रा का अतिरेक विशीर्ण हो गया है, नष्ट हो गया है। यदि तू नारी के शरीर से निर्ममत्व को ग्राम हुआ है तो शीघ्र ही ब्रह्म वीथी में विहार कर । परम ब्रह्म परमात्मा स्वरूप अपने शुद्ध आत्मा में रमण कर, उसी का अनुभव कर" । बाह्य विषयों से विमुख होकर शुद्ध आत्म स्वभाव में लीन हो ।।७५ ॥ यदि क्षपक का मन परमात्मा के सद्भाव (ध्यान) से शून्य हो जाता है तो क्या दोष आता है, उसको आचार्य कहते हैं
SR No.090057
Book TitleAradhanasar
Original Sutra AuthorDevsen Acharya
AuthorRatnakirtidev, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages255
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size6 MB
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