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________________ आराधनासार-९७ मनोवाण। मनश्चित्तं तदेवातिचंचलत्वाद्वाणः शरः मनोवाणस्तं मनोवाणं। कीदृशं कुरुष्व। मोक्षगतं सकलकर्मविप्रमोक्षो मोक्षस्तत्र गत; स्थितः मोक्षगत; तं मोक्षगतं अनंतसुखपदप्रतिष्ठितं निजमनो विधेहि । परीषहादिवैरिव्रातजनितातंकं हित्वेति भावार्थः। यथा कश्चिच्छूर: तनुत्राणेन तनुं परिवेष्य वै शाखादिस्थान विरचयित्वा वाणं मोक्षगत विसर्गगतं कुरुते तथा ।।४५ ॥ परीषहदवदहनतप्तो यदि ज्ञानसरोवरे प्रविशति जीवस्तदा किं लभते इत्यावेदयत्याचार्य: परिसहदवग्गितत्तो पइसइ जइ णाणसरवरे जीवो। ससहावजलपसित्तो णिव्वाणं लहइ अवियप्यो॥४६॥ परीषहदवाग्नितप्तः प्रविशति यदि ज्ञानसरोवरे जीवः । स्वस्वभावजलप्रसिक्तो निर्वाणं लभते अविकल्पः॥४६ ।। परिसहदवग्गितत्तो परीषहदवाग्नितप्तः उक्तलक्षणाः परीषहास्त एत ट्राणिः शुत्पिपासादिभिः शरीरसंतापजनकत्वात् तेन तप्तः सन् जीवो जीवः आत्मा णाणसरवरे ज्ञानसरोवरे अमीभिः परीषहैर्यद्वाध्यते तदहं न भवामि योऽहं स परीषहलेशैरपि स्पृष्टमपि न शक्यः। शरीरात्मनोरत्यंतमंतरमिति लक्षितत्वादित्यादि भेदज्ञानं तदेव सरोवरं तत्तापापोहाय मोहापोहिभिरवाहितत्वात् जड़ पविसइ यदि प्रविशति यदि प्रवेश करोति तदा। किं भवतीत्याह। ससहावजलपसित्तो स्वस्वभावजलप्रसिक्तः तत्र स्वस्वभाव: कर्म से रहित एवं अनन्त सुख पद में स्थित मोक्ष पद में लगावो । अर्थात् परीषहों रूपी वैरियों के समूह से उत्पन्न आतंक (मनोविकार) को छोड़कर अपने मनको मोक्षमार्ग में स्थिर करो। जैसे कोई शूरवीर योद्धा तनुत्राण (कवच) से अपने शरीर की रक्षा करके (कवच को पहनकर) शत्रु पर बाण छोड़ता है और शत्रु के बाण को सहन करता है उसी प्रकार हे आत्मन् ! तुम भी गुप्ति रूपी कवच को पहनकर परीषह रूपी शत्रुओं के बाणों को सहन करो और स्वकीय मन रूपी बाण को मोक्ष में स्थिर करो |॥४५॥ “यदि परीषह रूपी दावानल से संतप्त जीव ज्ञानरूपी सरोवर में प्रवेश करता है तो उसको क्या प्राप्त होता है ?"ऐसा प्रश्न करने वाले शिष्य को आचार्य कहते हैं परीषह रूपी दावानल से संतप्त हुआ यह संसारी प्राणी यदि ज्ञान रूपी सरोवर में प्रवेश करता है तो स्वस्वभाव रूपी जल से अभिषिक्त होने से निर्विकल्प होकर वेदना को भूलकर निर्वाण को प्राप्त करता है॥४६॥ क्षुधा (भूख), प्यास, शीत, उष्ण आदि के द्वारा शरीर को संतापकारी होने से परीषह को अम्मि कहा है। उस परीषह रूपी अग्नि से संतप्त हुआ प्राणी (भव्यात्मा) "मैं शरीर से अत्यन्त भिन्न हूँ. इन परीषहों के द्वारा मैं बाध्यमान (दुःखी) नहीं हो सकता, ये मेरे निज स्वरूप को घात वा विकल करने में समर्थ नहीं हैं," इस प्रकार शरीर के मोह को दूर करने वाले और निज स्वरूप का अनुभव कराने वाले भेदविज्ञान रूपी सरोवर में प्रवेश करता है तो सहज शुद्ध चैतन्य निर्विकार परमात्मा स्वरूप मेघ (बादल) से उत्पन्न,
SR No.090057
Book TitleAradhanasar
Original Sutra AuthorDevsen Acharya
AuthorRatnakirtidev, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages255
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size6 MB
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