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________________ आराधनासार-८० बाहिरजोएहि बाह्ययोगैः अशेषकर्मधर्मजनितसंतापविनाशहेतुभूतसाम्यविराजमानशुद्धपरमात्मसंलीनमनोयोगविलक्षणैः शीतातपवातोर्ध्वसंस्थानादेशदानादिकायवाग्व्यापारनिरोधलक्षणैर्बाह्ययोगैः। क्व। शरीरे। कियत्कालं निरर्था स्यादित्याह। जाष ण सल्लिहइ यावन्न सल्लिखति यावन्न परित्यजति । कान्। कसाए कषायान् कषंति विनाशयति । चारित्रपरिणाममिति कषायास्तान मुनिना बाह्ययोगेन सा सल्लेखना कृता अंत: कषायपरिणामसद्भावात् सकला विफला सा भवतीति मत्वा निष्कषायत्वं प्रपद्य परमात्मानमाराधयतेति तात्पर्यम् ।।३५॥ ननु भगवन् कषायेषु का शक्तिः एते जगतः किं कुर्वन्तीति पृच्छंतं प्रत्याह अस्थि कसाया बलिया सुदुज्जया जेहि तिहुअणं सयलं। भमइ भमाडिजंतो चउगइभवसायरे भीमे ॥३६ ।। अस्थि कषाया बलिन: सुदुर्जया यैत्रिभुवनं सकलम्। भ्रमति भ्राम्यमानं चतुर्गतिभवसागरे भीमे ॥३६ ।। अस्थि संत्यर्थे वर्तते । के। कसाया कषायाः कथंभूताः। बलिया बलिन: अनादिकर्मबंधवशादनंतशक्तरात्मनः स्ववशीकरणत्वात्, वीर्यवंत इत्यर्थः । पुन : कथंभूताः। सुदुर्जया चतुर्थगुणस्थानमारभ्योपशांतकषायगुणस्थानावधिवर्तमानावस्थारणभूमौ मुनिमल्लैश्चिरस्वेच्छा के शारीरिक कष्टों को सहन करना, दान-पूजा आदि करना ये बाह्य योग हैं। इन बाह्य योगों के द्वारा जो मुनि स्वकीय शरीर का शोषण करता है, पंचेन्द्रिय विषयों का त्याग भी करता है, परन्तु आन्तरिक भावों से कषायों को कृश नहीं करता है, उसकी सल्लेखना सार्थक (सकल कर्मों का क्षय करने रूप प्रयोजन को सिद्ध करने वाली) नहीं होती। क्योंकि अंतरंग में चारित्र की घातक, आत्मशुद्धि की विनाशक कषायों का सद्भाव होने से शुद्धात्मा का अनुभव और परमात्मा की आराधना नहीं हो सकती। इसलिए कषायों को कृश किये बिना बाह्य योग के द्वारा शरीर को कृश करना व्यर्थ है। ऐसा जानकर हे क्षपक ! निष्कषायत्व भाव को प्राप्त करके परमात्मा की आराधना करो।।३५ ।। 'हे भगवन् ! कषायों में कैसी शक्ति है और ये जगत् का क्या करती हैं?' इस प्रकार का प्रश्न करने वाले शिष्य को आचार्य प्रत्युत्तर देते हैं हे शिष्य ! ये कषायें बहुत बलवान और दुर्जय हैं जिनके द्वारा भ्राम्यमान तीनों लोक भयंकर चार गति रूप संसार-सागर में भ्रमण कर रहे हैं।॥३६॥ अनन्त शक्तियुक्त आत्मा को अनादि कर्मबंध के कारण अपने वश में करने वाली होने से कषायें बलवन्त हैं। अर्थात् अनन्त शक्ति वाला आत्मा अनादि काल से कषायों के वश हो रहा है। चतुर्थ गुणस्थान से लेकर उपशांत कषाय पर्यन्त गुणस्थान तक वर्तमान अवस्था रूप रणभूमि में मुनिराज रूपी महायोद्धा के द्वारा चिरकाल से स्वेच्छा से आचरण करने के अधीन होने से (अनादिकाल
SR No.090057
Book TitleAradhanasar
Original Sutra AuthorDevsen Acharya
AuthorRatnakirtidev, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages255
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size6 MB
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