SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 113
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ आराधनामार-७८ इत्युक्तलक्षणयोर्बाह्याभ्यंतरग्रंथयोस्त्यागे कृते सति परमार्थनिर्ग्रन्थो भवन् स्वस्वरूपाराधको भवतीत्यभिप्रायः ॥३३ ।। एवं माथाचतुष्टयेन संगत्यागो व्याख्यातः, अधुना क्रमायातायाः कषायसल्लेखनाया व्याख्यानं गाथाषट्केन कृत्वा आचार्यों निरूपयतीति समुदायपातनिका ।।३३।। ननु कषायसल्लेखनाकारी अपको यः स कथंभूतो भवतीति वदतं प्रत्याह इंदियमयं सरीरं णियणियविसएसु तेसु गमणिच्छा। ताणुवरि हयमोहो मंदकसाई हवइ खवओ॥३४॥ इंद्रियमयं शरीरं निजनिजविषयेषु तेषु गमनेच्छम् । तेषामुपरि हतमोहो मंदकषायो भवति क्षपकः ।।३४ ।। हवइ भवति । कोसौ। खवओ क्षपकः । किं भवति। मंदकसाई मंदकषायी। किं विशिष्टः । क्षपक्रः । हतमोहो हतमोहः हतो निराकृतो मोहो मूर्छा ममत्वपरिणामो येन स हतमोहः । क्व । उरि उपरि । केषां तेषां स्वस्वविषयाणां । तेषामुपरीति किं तदेवस्पष्टमाह । भवति तत् शरीरं । किं भवति । गमणिच्छा गमनेच्छं गमने इच्छा यस्य तत् गमनेच्छ जिगमिषु। क्व। णिणियविसएसु निजनिजविषयेषु स्वकीयस्वकीय स्पर्शरसगं धवर्णशब्दलक्षणेषु । विषयेषु इत्युक्ते शरीरादावतिन्यामिः तन्निरासार्थं इंदियमयं होता है। अतः बाह्य में शरीर-धन-धान्य आदि का और अंतरंग में पंचेन्द्रिय विषयों की अभिलाषाओं का त्याग करके हे क्षपक ! निज आत्मा की आराधना करो, निजात्मा का अनुभव करो, स्व-स्वरूप में रमण करने का प्रयत्न करों। ___इस प्रकार समाधि की साधक अर्ह' 'संगत्याग' आदि सात कारणों में कथित 'संगत्याग' का चार गाथाओं के द्वारा क्रथन किया। अब आचार्यदेव छह गाथाओं के द्वारा क्रम से प्राप्त कषाय-सल्लेखना का कथन करते हैं और उसके स्वरूप का निरूपण करते हैं।।३३ ।। कषाय-सल्लेखना करने वाला क्षपक कैसा होता है? ऐसा शिष्य के द्वारा प्रश्न करने पर आचार्यदेव कहते हैं यह शरीर इन्द्रियमय है, निज-निज विषयों में गमन (सेवन) करने की इच्छा (अभिलाषा) है। इन दोनों पर जो मोहरहित होता है, वह मन्दकषायी क्षपक कषाय-सल्लेखना वाला होता है॥३४॥ यह शरीर स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र (कर्ण) रूप पाँच इन्द्रियों से निर्मित है, रचित है। इन्द्रियमय शरीर की जो पंचेन्द्रिय विषयभोग की अभिलाषा है, इच्छा है, यही संसार-परिभ्रमण का कारण है अर्थात् शरीर और पंचेन्द्रियों की अभिलाषा संसार का कारण है- कषाय-उत्पत्ति का हेतु है। जो क्षपक शरीर और इन्द्रियों की अभिलाषा का परित्याग करता है, शरीर और इन्द्रिय-विषयों के ममत्व परिणाम को, मूर्छा को छोड़ देता है वही मंद कषायी होता है।
SR No.090057
Book TitleAradhanasar
Original Sutra AuthorDevsen Acharya
AuthorRatnakirtidev, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages255
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size6 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy