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________________ 42 अनुगा श्रुतज्ञ अनुमा श्रुतज्ञ अन्तर्द्वन्द्वों के पार को मैंने अपने आधुनिक शैली के खण्ड-काव्य में इस प्रकार निबद्ध किया है कटवप्र के उत्तुंग शिखर पर आ रुके हैं त्रिकालदर्शी आचार्य भद्रबाहु । जान गये हैं निमित्त - ज्ञान से वह कि अल्प रह गई है आयु शेष, समय है निकट, कर्मों की निर्जरा का, समाधि में तल्लीनता का । छोड़ दिया उन्होंने संघ को, कर दिया विदा समग्र शिष्यमंडली को कि बढ़ जाये वह आगे, 1 नये आचार्य की अनुज्ञा में साथ रह गया है केवल एक शिष्य दीक्षा नाम प्रभाचन्द्र, ( इतिहास- नाम सम्राट् चन्द्रगुप्त ) 1.. गुरु की सेवा का एकाकी पुण्य अवसर छोड़ा नहीं उस साम्राज्य - त्यागी ने । सम्यक् चारित्र की आराधना से सदा पवित्र बैठ गये गुरु, विस्तीर्ण शिलाओं के शीतल पटल पर, संन्यास धारण कर, समाधिमरण हेतु । कालान्तर में इसी कटवत्र से समाधि प्राप्त की सात सौ ऋषियों ने । : कितना पवित्र है गिरिशृंग ! बार-बार नमस्कार करने को मन होता है । : मेरा मन अटक गया है शिलालेख की पहली पंक्ति पर, दो शब्दों पर : 'सिद्ध स्वस्ति' । : दोनों शब्द कितने अर्थपूर्ण हैं । 'सिद्धं, अर्थात् सब कार्य सिद्ध हों और 'स्वस्ति' अर्थात् सबका कल्याण हो । : इसको यों समझना चाहिए कि 'सिद्ध' अर्थात् सिद्ध भगवान को नमस्कार हो । सिद्ध का अर्थ सिद्ध परमेष्ठी । जैन-धर्म की परम्परा का है यह शब्द । शिलालेख का पहला श्लोक भगवान महावीर की श्रद्धा-स्मृति में है । उसके पहले
SR No.090050
Book TitleAntardvando ke par
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLakshmichandra Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1993
Total Pages188
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Sermon
File Size37 MB
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