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________________ 120 अन्तर्द्वन्द्वों के पार (4) विन्ध्यगिरि के शिखर पर प्रद्योत, भव्यजन के बोध-सौध-शिखासुमणि, शान्तिदायक पूर्णचन्द्र त्रिलोक के, नित्य मैं उन गोम्मटेश्वर को नमूं। (5) समाच्छादित लताओं से तुङ्ग तन, भव्य प्राणी पा गये तर कल्प, इन्द्रगण नित पूजते पद-पद्म, नित्य मैं उन गोम्मटेश्वर को नमूं। जो दिगम्बर श्रमण नित भय-मुक्त, त्यक्त अम्बर, शान्त मन, परिशुद्ध, जन्तु यहि तन पर, तदपि निष्कम्प, नित्य मैं उन गोम्मटेश्वर को नमूं। विगत आश-निराश, निर्मल दृष्टि, सुख अवांछित, दोष सब निर्मूल, मन विरागी, भरत-शल्य-विलीन, नित्य मैं उन गोम्मटेश्वर को नमूं । (8) धाम-धन वजित, उपाधि-विमुक्त, मोह-मद-माया रहित, सम भाव, वर्ष का उपवास धर, ध्यानस्थ, नित्य मैं उन गोम्मटेश्वर को नमूं।
SR No.090050
Book TitleAntardvando ke par
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLakshmichandra Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1993
Total Pages188
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Sermon
File Size37 MB
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