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________________ अन्तर्द्वन्द्वों के पारं प्राकृत में 'समयसार' जैसे श्रेष्ठ सिद्धान्त-ग्रन्थों के रचनाकार हैं। मथुरा प्रदेश की शौरसेनी प्राकृत को अपनी भाषा का आधार बनाकर जिन्होंने उत्तर की भावधारा को दक्षिण में और दक्षिण की विचार धारा को उत्तर में प्रवाहित किया। पुराविद् : श्रवणबेल्गोल के शिलालेख इनके पुण्य-स्मरण से पूरित हैं। श्रुतज्ञ : मूल संघ और कुन्दकुन्द-आम्नाय के आचार्यों की पट्टावली श्रवण बेल्गोल के शिलालेखों के आधार पर ही तो तैयार की गई है। उसे देखें तो सही-कितनी विशाल और समर्थ ज्ञान-परम्परा है यह ! आचार्य पदावली का प्रदर्शन] अनुगा : मेरा प्रश्न अधूरा रह गया। क्या जैनधर्म को विरोधियों का आक्रमण सहन नहीं करना पड़ा ? इस बात का क्या आधार कि तन्त्र-मन्त्र के चमत्कारों के कारण अन्य धर्मावलम्बी बांजी ले गये ? पुराविद : दसवीं शताब्दी के अन्त में राष्ट्रकूट और गंगराज वंश एक साथ पतनोन्मुख हो गये । और, उनके साथ ही जैनधर्म का प्रभाव क्षीण होता गया। उधर वीरशैवों के प्रति जैन मान्यतावालों का उपेक्षा भाव रहा। जब बसवेश्वर ने शव धर्म का पुनरुद्धार किया और जैनियों का राज्यसंरक्षण प्रभावहीन हो गया तो बसव के उत्तराधिकारियों ने शान्तरों, चंगाल्वों और कारकल के भैरव ओडयरों, कुर्ग के राजाओं तथा अन्य छोटे-मोटे राज्यों के शासकों को जैनधर्म से पराङ्मुख बनाकर शवधर्म में दीक्षित कर लिया। यह इतिहास की स्वाभाविक गति थी। सन् 1195 के एक शिलालेख का उल्लेख 'मेडिवल जैनिज्म' के पृष्ठ 281 पर मिलता है जिसमें कहा गया है : "शिवभक्त एकान्त रामय्य समस्त शैव तीर्थों का दर्शन करने के पश्चात् पुलिगेरे आया। वहाँ के स्थानीय देवता सोमनाथ ने उसे जनों के विरुद्ध धर्मयुद्ध करने के लिए प्रेरित किया। अतः रामय्य जनों के एक प्रमुख केन्द्र अव्वलूर नामक स्थान में गया और उसने अपना प्रभुत्व प्रमाणित करने के लिए जैनों को चुनौती दी। उसने कहा कि वह अपने धर्म का महत्त्व प्रमाणित करने के लिए अपनी गरदन काट देगा और फिर शिव के प्रभाव से उसकी गरदन जुड़ जायेगी। यह सुन कर जैनों ने वचन दिया कि यदि वह ऐसा कर सकेगा तो हम लोग शवधर्म स्वीकार कर लेंगे। उन्होंने एक ताड़पत्र पर इसको लिख भी दिया। रामय्य ने अपनी गरदन काटकर शिव को चढ़ा दी और सात दिन बाद उसकी गरदन पुनः जुड़ गयी। पश्चात रामय्य ने जैनों को सताया और उनकी मूर्तियां तोड़ डालीं। जैनों ने राजा विज्जल (1156
SR No.090050
Book TitleAntardvando ke par
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLakshmichandra Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1993
Total Pages188
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Sermon
File Size37 MB
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