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________________ श्रवणबेलगोल के शिलालेख... को कोल्हू में पिलवा दिया। पुराविद् : यह बात प्रचलित तो है, लेकिन ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि यद्यपि विष्णुवर्धन ने अपना धर्म परिवर्तन कर लिया था, किन्तु उसकी रानी शान्तलदेवी जैनधर्म की कट्टर भक्त थी । उसके पिता शेव थे, उसकी माता जिन भक्त थी । शान्तलदेवी ने अपने गुरु प्रभाचन्द्र सिद्धान्तदेव की प्रेरणा से जैनधर्म की उन्नति के अनेक कार्य किये । उसने सन् 1123 में श्रवणबेलगोल में शान्तिनाथ भगवान की मूर्ति स्थापित की । शान्तलदेवी ने श्रवणबेलगोल का प्रसिद्ध मन्दिर बनवाया । मन्दिर का नाम भी विशेष - सर्वातिगन्धवारण, अर्थात् सोत रूपी हाथी के मद को चूर करने वाला, अथवा उच्छृंखल सौतों का गर्व चूर-चूर कर देने वाला मत्तहाथी । अनुगा : कोई रूपवती एवं गर्विता नारी ही ऐसा करेगी । पुराविद् : इसमें सन्देह नहीं कि शान्तल अत्यन्त रूपवती थी, गायन और नृत्य में कुशल | पति विष्णुवर्धन उसके दश में। साथ ही शिलालेख क्रमांक 176 और 162 में उसकी धार्मिकता की जो प्रशंसा लिखी है, वह भी उसके लिए गर्व की बात है । उनमें उसके पातिव्रत और धर्मपरायणता की भूरि-भूरि प्रशंसा है । उसे रुक्मिणी, सत्यभामा और सीता के समान कहा गया है । और, उसके वैराग्य की पराकाष्ठा यह कि 1131 ई० में उसने शिवगंग स्थान में सल्लेखनापूर्वक समाधिमरण किया ! वाग्मी त 85 वाग्मी श्रुतज्ञ : बार-बार कैसे यह तथ्य सामने आ जाता है कि अनेक सांसारिक उपलब्धियों - यश, मान-मर्यादा, रूप और गुण के गौरव के भोग के बीच के सांस्कृतिक प्रभाव में व्यक्ति अपने अन्तिम लक्ष्य की प्राप्ति से नहीं जैन धर्म चूकता वहाँ सब कुछ त्याग, संयम और प्राणीमात्र के लिए समभाव में समाविष्ट हो जाता है । : यह तीर्थंकरों की परम्परा का प्रताप है; गौतम गणधर और भद्रबाहु स्वामी जैसे निर्ग्रन्थ महामुनियों का प्रभाव है । : आचार्यों के इस प्रसंग में हम कुन्दकुदाचार्य का उल्लेख कैसे भूल गये ? : उनका नाम मैं तो नहीं भूला । कैसे भूल सकते हैं उन्हें जो जैनधर्म के मंगल-स्मरण में भगवान महावीर और गौतम गणधर के बाद हृदय में विराजमान रहते हैं । प्रत्येक शास्त्र - सभा जिनके स्मरण से प्रारम्भ होती है । प्रत्येक गुरु-शिष्य-पट्टावली में जिनका नाम प्रमुख है। जैन सिद्धान्त के जो अद्वितीय आदि व्याख्याताओं में हैं । जो शौरसेनी
SR No.090050
Book TitleAntardvando ke par
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLakshmichandra Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1993
Total Pages188
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Sermon
File Size37 MB
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