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________________ एकोनत्रिंशत्तमं पर्व मालिनी अवनिपतिसमाजे नानुयातस्तुरं गैरकृश विभव योगान्निर्जयन् लोकपालान् । प्रतिदिशमुपवनाशिष चक्रपाणिः शिविरमविश दुच्चैर्वन्दिनां पुण्यघोषैः ॥ १६३॥ अथ सरसिजिनीनां गन्धमादाय सान्द्रं श्रुततटवनवीथिर्मन्दमावान् समन्तात् । श्रममखिलमनौसीत् कर्तुमस्योपचारं प्रहित इव सगन्धः सिन्धुना गन्धवाहः ॥ १६४ ॥ अविदितपरिमाणैरन्वितो रखशङ्खः" स्फुरितमणिशिखाग्रैर्भोगिभिः लेवनीयः । सततमुपचितात्मा रुढ दिक्चक्रवालो जलनिधिमनुजहे तस्य सेनानिवेशः ॥ १६५ ॥ 3 शार्दूलविक्रीडितम् 98 तत्रावासितसाधन निधिपतिर्गत्वा रथेनाम्बुधिं जैत्रास्त्रप्रतितर्जितामरसमस्तं व्यन्तराधीश्वरम् । जित्वा मागधवत् क्षणाद्वरतनुं तत्साह्वमम्भोनिधेद्वीपं शश्वदलं चकार यशसा कल्पान्तरस्थायिना ॥ १६६ ॥ लेभे भेद्यमुरछदं वरतनोग्रैवेयकं च स्फुरच्चूडारवमुदंशु दिव्यकटकान् सूत्रं च रत्नोज्ज्वलम् । सहलैरिति पूजितः स भगवान् श्रीवैजयन्तार्णव द्वारेण प्रतिसंनिवृत्य कटकं प्राविशदुत्तोरणम् ॥ १६७॥ सेनाओं में क्षण-भर के लिए बड़ा भारी क्षोभ उत्पन्न हो गया था ।। १६२ ।। घोड़ोंपर बैठे हुए अनेक राजाओं का समूह जिसके पीछे-पीछे चल रहा है ऐसा वह चक्रवर्ती अपने बड़े भारी वैभवसे लोकपालों को जीतता हुआ तथा प्रत्येक दिशासे बन्दीजनोंके मंगल गानोंके साथ-साथ आशीर्वाद सुनता हुआ अपने उच्च शिविर में प्रविष्ट हुआ ।। १६३॥ अथानन्तर जो किनारेके वनकी पंक्तियोंको हिला रहा है ऐसा वायु कमलिनियोंकी उत्कट गन्ध लेकर धीरे-धीरे चारों ओर बह रहा था और समुद्र के द्वारा भेजे हुए किसी खास सम्बन्धी के समान चक्रवर्ती के समस्त परिश्रमको दूर कर रहा था ।। १६४ ।। उस समय वह चक्रवर्तीकी सेनाका स्थान ( पड़ाव ) ठीक समुद्रका अनुकरण कर रहा था क्योंकि जिस प्रकार समुद्र प्रमाणरहित शंख और रत्नोंसे सहित होता है उसी प्रकार वह चक्रवर्तीकी सेनाका स्थान भी प्रमाणरहित शंख आदि निधियों तथा रत्नोंसे सहित था, जिस प्रकार समुद्र, जिनके मस्तक - पर अनेक रत्न देदीप्यमान हो रहे हैं ऐसे भोगी अर्थात् सर्पोंसे सेवनीय होता है उसी प्रकार वह चक्रवर्तीकी सेनाका स्थान भी, जिनके मस्तकपर अनेक मणि देदीप्यमान हो रहे हैं ऐसे भोगी अर्थात् राजाओं के द्वारा सेवनीय था, जिस प्रकार समुद्र निरन्तर बढ़ता रहता है उसी प्रकार वह चक्रवर्तीकी सेनाका स्थान भी निरन्तर बढ़ता जाता था, और जिस प्रकार समुद्र सब दिशाओंको घेरे रहता है उसी प्रकार वह चक्रवर्तीकी सेनाका स्थान भी सब दिशाओंको घेरे हुए था ।। १६५ || जिसने अपनी सेना समुद्र के किनारे ठहरा दी है और जिसने अपने विजयशील शस्त्रोंसे मागध देवकी सभाको जीत लिया है ऐसे निधियोंके स्वामी चक्रवर्तीने रथके द्वारा समुद्रमें जाकर मागध देवके समान व्यन्तरोंके स्वामी वरतनु देवको भी जीता और समुद्रके भीतर रहनेवाले उसके वरतनु नामक द्वीपको कल्पान्त काल तक स्थिर रहनेवाले अपने यशसे सदा के लिए अलंकृत कर दिया ॥ १६६ ॥ भरतने वरतनु देवसे कभी न टूटनेवाला कवच, देदीप्यमान हार, चमकता हुआ चूड़ारत्न, दिव्य कड़े और रत्नोंसे प्रकाशमान यज्ञोपवीत इतनी वस्तुएँ प्राप्त कीं । तदनन्तर उत्तम रत्नोंसे जिसकी पूजा की गयी है ऐसे ऐश्वर्यशाली १ आगच्छन् । २ अपनयति स्म । ३ बन्धुः । ४ समुद्रेण । ५ चक्रादिरत्नशङ्खनिधिभिः । पक्षे मौक्तिकादिरत्नशङ्खैः । ६ पक्षे सर्पेः । ७ वद्धितस्वरूपः । ८ अनुकरोति स्म । ९ निवासितबलः । १० पूज्यः ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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